मेरी जमीन ले लो, पर उस गरीब का नुकसान न हो
इस निर्माण के दौरान एक ऐसा भावुक पल भी आया जिसने सामाजिक सद्भाव की नई परिभाषा लिख दी। जब मार्ग का नक्शा फारूक अहमद और मंजूर अहमद की जमीन के पास पहुंचा तो तकनीकी रूप से फारूक की जमीन का हिस्सा जाना तय था। फारूक आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं और उनकी जमीन छिनने का मतलब था आजीविका का अंत। यह देख मंजूर अहमद ने जो किया उसने सबका दिल जीत लिया। मंजूर ने आगे बढ़कर कहा फारूक गरीब है उसकी जमीन छोड़ दीजिए। सड़क के लिए जितनी जमीन चाहिए वह मेरी ले लीजिए। मंजूर के इस निस्वार्थ बलिदान ने यह सुनिश्चित किया कि गांव की तरक्की किसी गरीब के आंसू पर न टिकी हो।