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Pulwama: नहीं किया बजट का इंतजार, ग्रामीणों ने पसीने से खींची विकास की लकीर, मिलकर बना दिया संपर्क मार्ग

Sun, 28 Dec 2025 02:11 PM IST
निकिता गुप्ता अमर उजाला नेटवर्क, पुलवामा

सार

पुलवामा के फ्रासीपोरा गांव के ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार किए बिना खुद मिलकर एक किलोमीटर लंबा संपर्क मार्ग बना दिया। इस रास्ते से खेती-बागवानी करने वाले गांववासियों की फसल बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी और उनकी मुश्किलें कम होंगी।
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पुलवामा में संपर्क मार्ग बनाने के लिए जगह साफ करता बुलडोजर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इरादे नेक हों और समाज एक हो जाए तो पहाड़ का सीना चीरकर भी रास्ता बनाया जा सकता है। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के फ्रासीपोरा गांव ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। यहां के निवासियों ने सरकारी बजट और प्रशासनिक मंजूरी का इंतजार करने के बजाय खुद कुदाल-फावड़े उठाए और आपसी सहयोग से एक किलोमीटर लंबा संपर्क मार्ग तैयार कर दिया।

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यह केवल मिट्टी और पत्थर का रास्ता नहीं बल्कि एकता और बलिदान की एक ऐसी कहानी है जिसने सबके लिए मिसाल पेश की है। फ्रासीपोरा की अधिकांश आबादी खेती और बागवानी पर निर्भर है। वर्षों से संपर्क मार्ग न होने के कारण सेब के सीजन में बागवानों को अपनी फसल बाजार तक पहुंचाने में भारी कठिनाई होती थी। कीचड़ और ऊबड़-खाबड़ रास्तों के कारण मेहनत की कमाई मिट्टी में मिल जाती थी।

इस मुश्किल घड़ी में गांव के एक जागरूक युवा सज्जाद अहमद राथर ने कमान संभाली। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को समझाया कि अगर हम खुद आगे नहीं बढ़े तो विकास की यह राह और लंबी हो जाएगी। सज्जाद की ईमानदारी ने जादू जैसा काम किया और पूरा गांव अपने संसाधनों के साथ एक साझा मकसद के लिए खड़ा हो गया।
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आज फ्रासीपोरा से गोसू को जोड़ने वाला यह मार्ग तैयार है। औकाफ कमेटी और ग्रामीणों के इस साझा प्रयास ने यह साबित कर दिया कि विकास केवल सरकारी ग्रांट पर निर्भर नहीं होता बल्कि इसके लिए सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना जरूरी है। मार्ग बनने से ग्रामीणों की मुश्किलें कम हो जाएंगी।

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मेरी जमीन ले लो, पर उस गरीब का नुकसान न हो
इस निर्माण के दौरान एक ऐसा भावुक पल भी आया जिसने सामाजिक सद्भाव की नई परिभाषा लिख दी। जब मार्ग का नक्शा फारूक अहमद और मंजूर अहमद की जमीन के पास पहुंचा तो तकनीकी रूप से फारूक की जमीन का हिस्सा जाना तय था। फारूक आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं और उनकी जमीन छिनने का मतलब था आजीविका का अंत। यह देख मंजूर अहमद ने जो किया उसने सबका दिल जीत लिया। मंजूर ने आगे बढ़कर कहा फारूक गरीब है उसकी जमीन छोड़ दीजिए। सड़क के लिए जितनी जमीन चाहिए वह मेरी ले लीजिए। मंजूर के इस निस्वार्थ बलिदान ने यह सुनिश्चित किया कि गांव की तरक्की किसी गरीब के आंसू पर न टिकी हो।
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