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Jammu Kashmir: बढ़ते प्रदूषण के कारण मछलियां हुईं कम, अन्य काम ढूंढ़ रहे मछुआरे

Sun, 28 Dec 2025 01:08 PM IST
निकिता गुप्ता भट शहजाद अमर उजाला नेटवर्क, बांदीपोरा

सार

बांदीपोरा के लहरवालपोरा गांव में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण वुलर झील में मछलियों की संख्या घटने से धूप में सुखाई जाने वाली मछली की परंपरा संकट में है। मछुआरों को स्थिर आय नहीं मिलने के कारण अब वे अन्य काम करके परिवार का पेट पालने को मजबूर हैं।
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बांदीपोरा में बेचने से पहले सूखने के लिए मछुआरों की ओर से रखी गईं मछलियां। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के लहरवालपोरा गांव में मछुआरे दशकों से धूप में सुखाई गई मछली बनाते थे जो सर्दियों में पूरे इलाके में खाई जाती थी। वे इसे स्थानीय बाजारों में बेचते थे। यह परंपरा तेजी से खत्म हो रही है क्योंकि वुलर झील में प्रदूषण और पर्यावरण की गिरावट के कारण मछलियों की उपलब्धता कम होती जा रही है।

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स्थानीय रूप से हॉगार्ड के नाम से जानी जाने वाली इन मछलियों को स्थानीय बाजारों में बेचने से पहले सुखाया जाता है। खासकर सर्दियों में इसकी मांग बढ़ जाती है। स्थानीय मछुआरे मोहम्मद सुभान मल्ला ने कहा कि बिना ट्रीट किया हुआ घरेलू कचरा, प्लास्टिक प्रदूषण और पानी का घटता स्तर एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील में मछली प्रजनन पर बहुत बुरा असर डाल रहा है।

मछली पकड़ने में कमी के कारण सर्दियों के लिए धूप में मछली सुखाने की पारंपरिक प्रथा आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो गई है। मछुआरे नजीर अहमद ने कहा, झील हर साल सिकुड़ रही है। मछलियों की उपलब्धता तेजी से कम हो गई है। पहले यहां लगभग हर घर मछली पकड़ने और धूप में मछली सुखाने का काम करता था। अब केवल कुछ बुजुर्ग लोग ही इस प्रथा को जारी रखे हुए हैं।
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धूप में सुखाई गई मछली तैयार करने के लिए मछलियों को रस्सियों से बांधकर बाहर लटकाने के बाद लगभग तीन सप्ताह तक लगातार धूप की जरूरत होती है। हालांकि मछली पकड़ने में कमी और जलवायु परिवर्तन से जुड़े अप्रत्याशित मौसम ने इस प्रक्रिया को बाधित कर दिया है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि सर्दियों में धूप में सुखाई गई मछलियों की मांग बढ़ जाती है क्योंकि इसे सर्दियों में सबसे अच्छा भोजन माना जाता है।

मछुआरों को मछली पकड़ने से अब स्थिर आय नहीं मिल रही है इसलिए लावलपोरा के कई निवासी अपने परिवारों का पेट पालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने लगे हैं। गांव के युवा लोगों ने कहा कि अनिश्चितता और कम कमाई के कारण वे मछली पकड़ने का काम धीरे-धीरे पूरी तरह से छोड़ रहे हैं। इस गांव की पहचान इसकी मछली पकड़ने की संस्कृति से थी। अगर झील की हालत खराब होती रही तो यह परंपरा पूरी तरह से खत्म हो रही है। 

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बांदीपोरा में बेचने से पहले सूखने के लिए मछुआरों की ओर से रखी गईं मछलियां। - फोटो : अमर उजाला
बढ़ते प्रदूषण और घटती ऑक्सीजन से मर रहीं वुलर में मछलियां
कन्जरवेशन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के एक अधिकारी ने बताया कि वुलर में मछलियों की संख्या घटती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण वुलर में प्रदूषण और ऑक्सीजन की मात्रा का कम हो जाना है। तमाम तरह के जागरूकता कार्यक्रमों के बाद भी वुलर झील में कचरा फेंकने की प्रथा बंद नहीं हुई है जिससे सीधा नुकसान जल के जीवों और वनस्पतियों को हो रहा है। इसका असर मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है।
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