कृषि उत्पादन विभाग के अनुसार बीते नौ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में धान की खेती का रकबा करीब 3.045 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.588 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसके उलट, पिछले दो दशकों में सेब की खेती का क्षेत्रफल करीब 60 प्रतिशत बढ़कर 1.73 लाख हेक्टेयर हो गया। इसी दौरान दूसरे राज्यों से जम्मू-कश्मीर आने वाले चावल की आपूर्ति भी बढ़ी है। वर्ष 2022-23 में यह मात्रा 3.74 लाख टन थी, जो 2024-25 में बढ़कर 4.86 लाख टन पहुंच गई। यानी आपूर्ति में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
कमाई की चाह में बदल रही खेती
कृषी विशेषज्ञ मंदीप सिंह बताते हैं कि सेब की बागवानी किसानों के लिए आय का अहम जरिया है। बाजार में मांग और बेहतर कमाई की संभावना उन्हें बागवानी की ओर आकर्षित करती है। दूसरी ओर, धान की खेती में श्रम, पानी, लागत और मौसम से जुड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में खेती के फैसले बदल रहे हैं। हालांकि, यह बदलाव किसानों की आय के अवसर बढ़ाता है, लेकिन स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन बनाए रखने की चुनौती भी पैदा करता है।
मुश्कबुदजी की विरासत बचाने की जरूरत
कश्मीर का पारंपरिक सुगंधित चावल मुश्कबुदजी अपने विशिष्ट स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसकी पहचान बनाए रखने के लिए किसानों को उचित मूल्य, बेहतर बीज और बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है। मुश्कबुदजी घाटी की पहचान रहा है। इसके विकास के लिए हमें काम करना होगा।
इन प्रजातियों पर भी देना होगा ध्यान
मुश्कबुदजी के साथ ही कामद कश्मीर की प्रसिद्ध सुगंधित पारंपरिक किस्म। अपने स्वाद और पकने के बाद की बनावट के कारण इसे विशेष अवसरों और पारंपरिक भोज में शामिल किया जाता है। ऐसे ही जाग, नून बियोल, काव क्रीड प्रजाति भी घाटी की पहचान है।