- अधिकारियों ने अनंतनाग जिले में कई प्राचीन जीवाश्म स्थलों को संरक्षित करना शुरू किया
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। कश्मीर की भूवैज्ञानिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए अधिकारियों ने अनंतनाग जिले में कई प्राचीन जीवाश्म स्थलों को संरक्षित करना शुरू कर दिया है। ये स्थल करोड़ों वर्ष पुराने हैं और वैज्ञानिक जांच के बाद इनकी पुष्टि हुई है।
जम्मू-कश्मीर वन विभाग भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के सहयोग से तीन जीवाश्म-समृद्ध स्थलों को संरक्षण के दायरे में लाया है। इनमें से दो प्रमुख स्थल हलसिदार और सासखुदन काप्रान वेरिनाग वन रेंज में स्थित हैं। इन स्थलों को पहले ही बाड़ लगाकर सुरक्षित किया जा चुका है, साथ ही सूचना बोर्ड और आगंतुकों के लिए दिशा-निर्देश भी लगाए गए हैं क्योंकि ये वन क्षेत्र में आते हैं।
अधिकारियों ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य दुर्लभ जीवाश्म संपदा की रक्षा करना, कश्मीर के प्रागैतिहासिक अतीत के बारे में जागरूकता फैलाना तथा शिक्षा, वैज्ञानिक अध्ययन और सतत पर्यटन (जियो-टूरिज्म) के अवसर पैदा करना है। बाड़बंदी, साइनबोर्ड और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए निर्देश लगाए गए हैं ताकि किसी तरह का नुकसान न हो और आगंतुक संवेदनशील रहें। जीएसआई ने कोकेरनाग वन रेंज के लारू क्षेत्र में मासवती नर्संगर में एक और जीवाश्म जियो-साइट की पहचान की है, जो लगभग 26 करोड़ वर्ष पुराना माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थल डायनासोर युग से भी पहले के जीवन रूपों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। वन विभाग जीएसआई के तकनीकी सहयोग से इन स्थलों का संरक्षण और विकास कर रहा है। इससे शैक्षणिक अनुसंधान को भी बढ़ावा मिलेगा। छात्र और शोधकर्ता इन स्थलों पर जाकर जीवाश्म नमूनों का अध्ययन कर सकेंगे।
विषय विशेषज्ञ रऊफ हमजा ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि ये स्थल पहले असुरक्षित थे लेकिन अब बाड़ लगने से राहत मिली है। इन जीवाश्म स्थलों को वेरिनाग और सरबल जैसे पर्यटन स्थलों के साथ पर्यटन मानचित्र में शामिल किया जाए। पिछले पांच वर्षों में दक्षिण कश्मीर के स्कूल शिक्षकों, छात्रों और युवा शोधकर्ताओं द्वारा की गई खोजों ने इस संरक्षण अभियान को गति दी है। अनंतनाग और कुलगाम जिलों में कई जीवाश्म स्थलों की खोज हुई जिन्हें जीएसआई ने वैज्ञानिक रूप से जांचा और मैप किया है।
हलसिदार और सासखुदन काप्रान स्थलों की शुरुआती रिपोर्ट जूलॉजी में स्नातकोत्तर फयाज अहमद हजाम ने की थी। यहां अमोनाइट्स, ब्रैकियोपॉड्स, बाइवल्व्स और पौधों के अवशेष जैसे विविध जीवाश्म पाए गए हैं जो जुरासिक काल (15-20 करोड़ वर्ष पुराने) के हैं। जीएसआई कश्मीर के निदेशक अब्दुल कयूम पॉल ने कहा कि ये स्थल उच्च शोध मूल्य के हैं और अब वन विभाग की सुरक्षा में हैं। वेरिनाग रेंज अधिकारी यासिर अमीन और कोकेरनाग रेंज अधिकारी अदनान ने बताया कि बाड़बंदी पूरी हो चुकी है और पर्यटन को नियंत्रित तरीके से ही अनुमति दी जाएगी ताकि कोई क्षति न पहुंचे।
इस खोजों की शुरुआत अगस्त 2021 में आहरबल (कुलगाम) से हुई थी, जहां शिक्षक रऊफ हमजा और मनजूर जावेद तथा छात्रों ने एक प्रमुख स्थल की रिपोर्ट की। ये स्थल ऑर्डोविशियन से डेवोनियन काल (48.8 से 35.4 करोड़ वर्ष पुराने) के हैं। नमूनों की उम्र की पुष्टि बीएआरसी जैसी राष्ट्रीय लैबों में हुई। अधिकारी मानते हैं कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी और वैज्ञानिक सत्यापन से दक्षिण कश्मीर अब भूवैज्ञानिक अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है। ये प्रयास कक्षा की जिज्ञासा को राष्ट्रीय स्तर की भू-धरोहर में बदल रहे हैं।