अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर के मुख्य मौलवी मीरवाइज उमर फारूक ने शुक्रवार को कहा कि घाटी में हिंसा में आई कमी स्वागत योग्य है लेकिन स्थायी शांति के लिए न्याय, सुलह और जनता के विश्वास को बहाल करना बेहद आवश्यक है। ऐतिहासिक जामिया मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जम्मू-कश्मीर पर हाल ही में जारी ‘इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप’ (आईसीजी) की रिपोर्ट का हवाला दिया।
मीरवाइज ने कहा कि रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि हाल के वर्षों में उग्रवाद, सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों और हिंसा में कमी आई है। इस बदलाव का हर कोई स्वागत करता है क्योंकि कश्मीर के लोगों से बेहतर शांति की कीमत कोई नहीं समझ सकता, जिन्होंने पिछले कई दशकों में भारी दर्द और नुकसान झेला है।
यह रिपोर्ट एक बुनियादी बिंदु की ओर भी ध्यान दिलाती है कि हिंसा में कमी का मतलब यह कतई नहीं है कि अंतर्निहित राजनीतिक शिकायतें सुलझ गई हैं या जनता का भरोसा पूरी तरह बहाल हो गया है। मीरवाइज ने कहा कि सुरक्षा जरूरी है और नागरिकों की जान-माल की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन केवल सुरक्षात्मक कदमों से उस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता,जिसके गहरे राजनीतिक और मानवीय आयाम हैं। उन्होंने दावा किया कि कश्मीर आज भी दुनिया के सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्रों में से एक बना हुआ है।
रिपोर्ट में रेखांकित की गई गिरफ्तारियों और पाबंदियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि 2019 के बाद से हिरासत और गिरफ्तारियों का पैमाना परेशान करने वाला है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2019 से 2023 के बीच जम्मू-कश्मीर में यूएपीए के तहत 3,662 लोगों को गिरफ्तार किया गया जबकि इस दौरान केवल 23 लोगों को ही दोषी ठहराया जा सका। ये आंकड़े लंबी हिरासत, उचित कानूनी प्रक्रिया और कड़े कानूनों के व्यापक इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हजारों परिवार कानूनी प्रक्रियाओं और अपनों के भविष्य की अनिश्चितता के साये में जीने को मजबूर हैं।
कश्मीरी कैदियों का जिक्र करते हुए मीरवाइज ने यासीन मलिक, शब्बीर अहमद शाह, शाहिद-उल-इस्लाम, इंजीनियर रशीद, आसिया अंद्राबी और मसरत आलम की निरंतर हिरासत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वह बुजुर्ग और बीमार कैदियों की मानवीय आधार पर रिहाई और मामलों की समीक्षा की अपनी अपील को दोहराते हैं, क्योंकि न्याय और करुणा को शांति की प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता।
मीरवाइज ने सवाल उठाया कि अगर घाटी में जमीनी हालात बेहतर हुए हैं तो क्या यह पाबंदियों में ढील देने, नागरिक स्वतंत्रता को बहाल करने और राजनीतिक गतिविधियों के लिए खुला माहौल बनाने का सही समय नहीं है। रिपोर्ट में राज्य का दर्जा बहाल करने, चुनी हुई सरकार को सार्थक अधिकार देने, कड़े आतंकवाद-रोधी कानूनों की समीक्षा करने और भारत-पाकिस्तान के बीच नए सिरे से बातचीत शुरू करने की सिफारिश की गई है, जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।