संवाद न्यूज एजेंसी
लेह। पर्यावरण कार्यकर्ता एवं शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में उत्पन्न स्थिति को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। सियांग घाटी में स्थानीय आदिवासी समुदाय, विशेषकर आदि समुदाय, प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
पत्र में वांगचुक ने क्षेत्र में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती, युवा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, ग्रामीणों को कथित रूप से डराने-धमकाने, आवागमन पर प्रतिबंध तथा परियोजना का विरोध कर रहे लोगों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादतियों पर चिंता जताई।
लद्दाख से समानता बताते हुए उन्होंने कहा कि दोनों क्षेत्रों के आदिवासी समुदाय अपनी पैतृक भूमि, नदियों, पहाड़ों और जंगलों से गहरा जुड़ाव रखते हैं। उन्होंने लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी, भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की लंबे समय से चली आ रही मांग का भी उल्लेख किया।
राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए वांगचुक ने कहा कि स्वयं एक आदिवासी समुदाय से आने के कारण वह इन समुदायों की चिंताओं को बेहतर ढंग से समझ सकती हैं। आदि समुदाय सियांग नदी को आने सियांग (मां सियांग) कहकर पुकारता है और उसके प्रति उनका संबंध वैसा ही है, जैसा लद्दाख के लोगों का अपनी नदियों और पहाड़ों के साथ है।
उन्होंने पर्यावरण और विकास से जुड़ी जायज चिंताएं उठाने वाले लोगों को राष्ट्रविरोधी या विदेशी वित्तपोषित बताने के प्रयासों पर भी चिंता जताई। बिना ठोस सबूत के ऐसे आरोप जनता के विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं।
हिमालय की नाजुक और भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील प्रकृति का उल्लेख करते हुए वांगचुक ने सिक्किम की तीस्ता घाटी में आई विनाशकारी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का हवाला दिया और कहा कि पहाड़ी नदी प्रणालियों में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप के गंभीर पर्यावरणीय जोखिम हो सकते हैं।
उन्होंने राष्ट्रपति से नागरिक क्षेत्रों से अतिरिक्त सुरक्षा बलों को हटाने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने, अनुचित आपराधिक मामलों को वापस लेने तथा पुलिस ज्यादतियों के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने की अपील की। उन्होंने प्रभावित आदिवासी समुदायों के साथ सार्थक बातचीत होने तक परियोजना से जुड़ी अपरिवर्तनीय गतिविधियों को रोकने और आगे बढ़ने से पहले परियोजना के पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक, भूकंपीय एवं सामाजिक प्रभावों का स्वतंत्र और व्यापक आकलन कराने की मांग की।
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