- पर्यावरण कार्यकर्ता भट का कहना है कि संयुक्त समिति पर्यावरण नुकसान के लिए जवाबदेही तय करने में विफल रही
- मुआवजा और कार्रवाई की मांग की
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। पर्यावरण कार्यकर्ता राजा मुजफ्फर भट ने सुखनाग नाले में अवैध और अवैज्ञानिक तरीके से किए जा रहे खनन से हुए पर्यावरणीय नुकसान को लेकर बडगाम प्रशासन से जवाबदेही की मांग करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाया है।
उन्होंने तर्क दिया है कि ट्रिब्यूनल की ओर से गठित संयुक्त समिति ने पारिस्थितिक नुकसान की बात तो स्वीकार की है लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में विफल रही है। भट ने एनजीटी की प्रधान पीठ के समक्ष दाखिल अपनी आपत्तियों में 6 मई 2026 की संयुक्त समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है। उन्होंने तर्क दिया कि हालांकि रिपोर्ट में पर्यावरण के नुकसान का उल्लेख है लेकिन इसमें न तो नुकसान के वित्तीय मूल्य का आकलन किया गया है और न ही उन अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है जिन्होंने कथित तौर पर इन खनन गतिविधियों की अनुमति दी थी।
यह मामला बडगाम जिले में सुखनाग नाले से जेसीबी और एलएंडटी क्रेन जैसी भारी मशीनों के माध्यम से खनिजों के कथित अवैध निष्कर्षण से संबंधित है। भट का आरोप है कि इन गतिविधियों ने नाले के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
सितंबर 2025 की कार्यवाही का हवाला देते हुए भट ने कहा कि सरकारी अधिकारियों ने पहले ट्रिब्यूनल को सूचित किया था कि अल्पकालिक परमिट के तहत खनन बंद कर दिया गया है और सुखनाग नाले में खनन कार्य रोक दिया गया है। अधिकारियों ने यह भी बताया था कि जनवरी 2024 से अगस्त 2025 के बीच 215 वाहनों को जब्त किया गया। 29.36 लाख का जुर्माना वसूला गया और 26 प्राथमिकी दर्ज की गईं।
इसके बाद एनजीटी ने पर्यावरण क्षति का आकलन करने और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने के लिए एक स्वतंत्र संयुक्त समिति का गठन किया था। भट का आरोप है कि समिति अपने कार्य को पूरा करने में विफल रही। समिति ने पारिस्थितिक नुकसान को स्वीकार तो किया, लेकिन पर्यावरण मुआवजे का निर्धारण नहीं किया और न ही किसी अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया।
भट द्वारा उठाई गई एक मुख्य आपत्ति अल्पकालिक निपटान परमिट जारी करने से संबंधित है। उन्होंने तर्क दिया कि अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी (ईसी) के अभाव के बावजूद ये परमिट जारी किए गए थे जो कि कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समिति बडगाम के उपायुक्त पर जवाबदेही तय करने में विफल रही, जो कथित रूप से इन परमिटों को जारी करने के लिए जिम्मेदार थे। भट ने प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के तहत पर्यावरणीय उत्तरदायित्व तय करने की मांग की है।
सामाजिक कार्यकर्ता ने एक ट्रॉट मछली किसान पीरजादा रईस का भी हवाला दिया जिनका फार्म कथित तौर पर खनन से प्रभावित हुआ था। हालांकि समिति ने मृत मछलियों के प्रत्यक्ष नुकसान का आकलन तीन लाख लगाया लेकिन भट का तर्क है कि इस अनुमान में केवल मृत मछलियों का मूल्य शामिल है, जबकि पूरे फार्म को हुए नुकसान का अलग से आकलन किया जाना चाहिए।
अपनी याचिका में भट ने ट्रिब्यूनल से सुखनाग नाले को हुए नुकसान के लिए पर्यावरण मुआवजे का आकलन करने, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने, पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के लिए जुर्माना लगाने और प्रभावित ट्रॉट फार्म के नुकसान की भरपाई का निर्देश देने का अनुरोध किया है। यह याचिका अधिवक्ता सौरभ शर्मा के माध्यम से एनजीटी के समक्ष दायर की गई है।