संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने कहा है कि कोई भी पक्ष ऐसे आदेश को चुनौती नहीं दे सकता जो उसकी अपनी सहमति से पारित किया गया हो। अदालत ने दोहराया कि ऐसा आदेश बाध्यकारी होता है और कानून में रोक लगाने का काम करता है।
न्यायमूर्ति वासिम सादिक नारगल की पीठ ने सिकंदर शर्मा ने शनिवार को अतिरिक्त आयुक्त जम्मू के एक आदेश के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया जिसमें भूमि विभाजन विवाद को प्रासंगिक विभाजन नियमों के तहत नई कार्यवाही के लिए तहसीलदार को भेजा गया था। अदालत ने कहा कि संशोधन प्राधिकरण का आदेश उन सभी पक्षों के वकील की सहमति से पारित किया गया था। एक बार ऐसा आदेश इस प्रकार की सहमति के आधार पर पारित हो जाने पर पक्ष धोखाधड़ी, जबरदस्ती, भ्रामक प्रस्तुति, या स्पष्ट अधिकार क्षेत्र की कमी के आधार पर चुनौती देने के अलावा इसे चुनौती देने से कानूनी रूप से रोका गया है।
न्यायालय के समकक्ष पीठ के एक निर्णय का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि सहमति की शर्तों को लिखित रूप में लाने की आवश्यकता नहीं है। जब तक कि रिकॉर्ड में यह दर्शाया गया हो कि आदेश सहमति के आधार पर पारित किया गया था।