हेरोइन तस्करी केस : जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स तस्करी नेटवर्क को कथित तौर पर वित्तीय सहायता (फाइनेंस) मुहैया कराने के आरोपी एक व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति एम. ए. चौधरी की पीठ ने सैयदपोरा, ईदगाह (श्रीनगर) निवासी शब्बीर अहमद वानी की जमानत अर्जी को खारिज किया। वानी के खिलाफ पुलिस स्टेशन राजबाग में दर्ज प्राथमिकी के तहत मुकदमा चल रहा है। वानी ने पिछले वर्ष पांच अगस्त को विशेष अदालत (एनडीपीएस मामले) की ओर से जमानत खारिज किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके पास से किसी प्रकार का मादक पदार्थ बरामद नहीं हुआ है और उसे मुख्य रूप से सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर फंसाया गया है, जो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। वानी के वकील ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने वानी के बैंक खाते में 1.50 लाख रुपये के ट्रांसफर का हवाला दिया है, जो वास्तव में एक वाहन की बिक्री से जुड़ा था। सौदा रद्द होने के कारण उसी दिन 1.48 लाख रुपये वापस भेज दिए गए थे।
वकील ने यह भी कहा कि वानी लगभग दो साल और पांच महीने से हिरासत में है और 33 में से 18 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं जिनमें से किसी ने भी सीधे तौर पर वानी को अपराध से नहीं जोड़ा है। जमानत का कड़ा विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि वानी व्यावसायिक मात्रा में हेरोइन की तस्करी के लिए वित्तीय मदद और सुविधा प्रदान करने में शामिल था। अभियोजन ने आशंका जताई कि रिहा होने पर वह फिर से ऐसी गतिविधियों में लिप्त हो सकता है।
चार्जशीट का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि वानी के बैंक खाते से सह-आरोपी गैरत अली के खाते में 5,000 रुपये भेजे गए थे, जहां से यह राशि मुख्य आरोपी सज्जाद अहमद बदाना के खाते में ट्रांसफर की गई। अभियोजन पक्ष ने इस वित्तीय लेनदेन को वानी और नशीले पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क के बीच संबंध दर्शाने वाली एक अहम कड़ी माना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन का मामला केवल मादक पदार्थों की भौतिक बरामदगी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आपराधिक साजिश के तहत तस्करी की फंडिंग और सह-आरोपियों के साथ संलिप्तता से भी जुड़ा है। अदालत ने टिप्पणी की, याचिकाकर्ता से कोई बरामदगी न होना एक ऐसी परिस्थिति है जिस पर मुकदमे के दौरान विचार किया जा सकता है, लेकिन इस स्तर पर यह जांच एजेंसी की ओर से एकत्र की गई अन्य सामग्री के आधार पर लगे आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं करता।
अदालत ने कहा कि जब मामला व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ा हो, तो जमानत देने से पहले एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत निर्धारित दो अनिवार्य शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहला, अदालत को यह विश्वास करने के लिए उचित आधार होना चाहिए कि आरोपी निर्दोष है और दूसरा, जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।