श्रीनगर। श्रीनगर की एक अदालत ने निशात के 22 वर्षीय युवक रुमान नजीर की संदिग्ध हालात में मौत के मामले में गंभीर कमियों और महत्वपूर्ण विरोधाभासों को देखते हुए आगे की जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि यह जांच डीएसपी रैंक के अधिकारी की ओर से की जाए।
मामले की विशेष जज एनडीपीएस मामले श्रीनगर विनोद कुमार ने रुमान के पिता नजीर अहमद हाफिज की ओर से दायर विरोध याचिका पर यह आदेश जारी किए। पुलिस ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर हाफिज की शिकायत के आधार पर निशात थाने में एफआईआर दर्ज की थी। बाद में पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/21, 27 और 29 के तहत चार्जशीट दाखिल की। इसमें रुमान और दो अन्य आरोपियों पर नशीले पदार्थों की ओवरडोज से मौत का आरोप लगाया गया था।
पुलिस जांच से असंतुष्ट हाफिज ने अपने वकील के माध्यम से दावा किया कि जांच अधूरी, पक्षपातपूर्ण थी तथा संदिग्ध परिस्थितियों के महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहा कि युवक 28 सितंबर 2024 को लापता हुआ था। एक अक्टूबर 2024 को आरोपियों के इशारे पर उसका शव बरामद किया गया। आरोपियों ने पहले दावा किया था कि उन्होंने रुमान को निशात में उसकी प्रेमिका से मिलने के लिए छोड़ दिया था और उसके बारे में कुछ नहीं पता लेकिन लगातार पूछताछ के बाद शव मिला। 0
जांच अधिकारी ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) रिपोर्ट पर भारी निर्भरता दिखाई जिसमें मृतक की अंतड़ियों से हेरोइन मिलने की बात कही गई लेकिन रिपोर्ट केवल पदार्थ की मौजूदगी दर्शाती है, न कि मौत सिर्फ ओवरडोज से हुई या यह स्व-प्रशासित था। एक बड़ी कमी यह उजागर हुई कि जांच अधिकारी ने मृतक की मां और भाई के बयान दर्ज नहीं किए। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि लापता होने के दिन रुमान ने अपनी मां को व्हाट्सएप कॉल पर बताया था कि आरोपियों ने निशात में गनी बेकर की दुकान के पास उसका पैसा लिया और झगड़ा हुआ।
चार्जशीट मुख्य रूप से आरोपियों के बयानों पर आधारित थी कि वे जम्मू गए। अज्ञात व्यक्ति से हेरोइन ली और बाद में ओवरडोज हो गया। अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि टोल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, होटल रिकॉर्ड, ईंधन रसीदें या टावर लोकेशन डेटा जैसे कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं जुटाए गए। अदालत ने कहा कि ये कमियां मामूली या तकनीकी नहीं, बल्कि मामले की जड़ से जुड़ी हैं। इसलिए विरोध याचिका मंजूर कर आगे की जांच के आदेश दिए।
अदालत ने श्रीनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि आगे की जांच डीएसपी रैंक या उससे ऊपर के अधिकारी द्वारा की जाए और 60 दिन में पूरी हो। हर 15 दिनों में प्रगति रिपोर्ट सौंपी जाए। इसमें उठाए गए कदम, जुटाए गए सबूत और पूछताछ किए गए गवाहों का विवरण हो। संवाद