- पहले गर्मी फिर बारिश और अब ठंड से तापमान में आई गिरावट, बागवानों को परागण में तबाही का सता रहा डर
- कम तापमान खासकर रात के समय बीजांड को मार रहा, बीजांड फूल का वह हिस्सा है जो निषेचन के बाद फल में बदलता है
अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। कश्मीर में सेब की फसल पर खतरा मंडरा रहा है। पहले अचानक पड़ी गर्मी ने सेब के बागों में समय से पहले ही फूल खिला दिए। फिर बारिश आ गई। अब तापमान में एकाएक आई गिरावट से बागवानों को परागण (पोलिनेशन) में भारी तबाही का डर सता रहा है। विशेषज्ञ बदलते जलवायु को मुख्य कारण बता रहे हैं।
फरवरी के मध्य से मार्च के मध्य तक पूरी घाटी में तापमान सामान्य से 6 से 11 डिग्री तक बढ़ गया। इससे तय समय से लगभग दो हफ्ते पहले ही कलियां खिलने लगीं और फूल आ गए। इसके बाद लगातार बारिश और पारे में गिरावट (सामान्य से 5 से 7 डिग्री कम) ने उस शुरुआती फायदे को संभावित क्षति में बदल दिया है।
मौसम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर हमारे बागों में साफ दिखाई दे रहा है। शोपियां, कुलगाम और उत्तरी कश्मीर के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे बना हुआ है जो परागण के लिए बेहद जरूरी सीमा है।
शोपियां के सेब उत्पादक बासित अहमद ने कहा कि कम तापमान, खासकर रात के समय, बीजांड को मार रहा है। हम अपनी फसल को पैदा होने से पहले ही मरते देख रहे हैं। बीजांड फूल का वह हिस्सा होता है जो निषेचन (फर्टिलाइजेशन) के बाद फल में बदल जाता है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. वसीम ने बताया कि अगर यह प्रक्रिया सफल नहीं होती तो कोई सेब नहीं उगेगा। प्रक्रिया को समझाते उन्होंने कहा कि जब तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे गिर जाता है तो मधुमक्खियों जैसे संभावित परागणकर्ता निष्क्रिय हो जाते हैं और अपने छत्तों के अंदर ही रहते हैं। इसका सीधा असर परागण और फल लगने की प्रक्रिया पर पड़ता है। भले ही फूल बहुत ज्यादा खिले हों लेकिन अगर परागण नहीं होगा तो कोई फसल नहीं होगी।
डॉ. वसीम ने कहा कि इस चरण में अगर एक हफ्ता भी ऐसा मौसम बना रहा तो सेब की पैदावार 30-40 प्रतिशत तक कम हो सकती है। सफल परागण के लिए समय बहुत कम रह गया है। सेब की खेती कश्मीर की आर्थिकता की रीढ़ है। यह इस क्षेत्र की कृषि जीडीपी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है इसलिए फूल आने के चरण में कोई भी रुकावट किसानों की आय को तबाह कर सकती है। कोल्ड स्टोरेज, परिवहन और फल मंडी प्रणाली पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
पिछले साल भी ओलों से खराब हो गई थी फसल
पुलवामा के बागवान मोहम्मद यूनिस ने कहा कि हमने पहले कभी लगातार ऐसा अनिश्चित मौसम नहीं देखा। पहले तो लगा कि वसंत आ गया। अब यह ठंड और बारिश। ऐसा लगता है जैसे मौसम अपना कैलेंडर ही भूल गया हो। सोपोर में एशिया की दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी के अध्यक्ष फैयाज अहमद मीर (काकाजी) ने कहा कि पिछले साल हमारी फसल ओलों की वजह से खराब हो गई थी। इस साल हो सकता है कि परागण न होने की वजह से खराब हो जाए। एक किसान आखिर कितने साल तक टिक पाएगा। यह कोई स्थानीय समस्या नहीं है।
इसे जलवायु आपातकाल घोषित करना चाहिए
सोपोर से लेकर शोपियां तक के बागवान बता रहे हैं कि मधुमक्खियों की गतिविधि बहुत कम हो गई है। सरकार को इसे जलवायु आपातकाल घोषित करना चाहिए और तुरंत मुआवजा देना चाहिए। वरना हमें ग्रामीण कश्मीर में एक बड़े कर्ज संकट का सामना करना पड़ेगा। इस बीच मौसम विभाग ने 12-15 अप्रैल तक बारिश या बर्फबारी की संभावना नहीं जताई है। और किसानों से कृषि गतिविधियां शुरू करने की सलाह दी है।