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Srinagar News: अभिनंदन होम के सात दिव्यांग छात्रों का 12वीं कक्षा की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन

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अमर उजाला ब्यूरो
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श्रीनगर। दृढ़ संकल्प का एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश करते हुए श्रीनगर के रामबाग स्थित अभिनंदन होम के सात दिव्यांग छात्रों ने 12वीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की है। बता दें कि अभिनंदन होम दिव्यांग बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित एक संस्थान है जिसके लिए यह गर्व का क्षण है।
सभी सात छात्र जो सुनने और बोलने में अक्षम हैं या दृष्टिबाधित हैं ने बेहतरीन अंक हासिल किए हैं। उन्होंने यह साबित किया कि जब सही सपोर्ट सिस्टम मौजूद हो तो शारीरिक सीमाएं शैक्षणिक उत्कृष्टता में कोई बाधा नहीं होतीं। इस उपलब्धि को शिक्षकों, माता-पिता और अन्य लोगों ने विशेष शिक्षा के प्रमाण के रूप में व्यापक रूप से सराहना की है।
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अभिनंदन होम के प्रिंसिपल मुदस्सिर अहमद ने कहा कि इस साल स्कूल के सात छात्रों ने 12वीं की परीक्षा दी थी और उनमें से हर कोई शानदार नंबरों से पास हुआ।
उन्होंने कहा कि संस्थान के इतिहास में यह केवल दूसरी बार है जब सीनियर सेकेंडरी स्तर पर इतना शानदार नतीजा आया है। इन बच्चों के लिए अभिनंदन होम सिर्फ एक स्कूल नहीं बल्कि उनकी एकमात्र उम्मीद है। अहमद ने आगे कहा कि पिछले कुछ सालों में संस्थान के सैकड़ों दिव्यांग छात्रों ने सफलतापूर्वक अपनी 12वीं की शिक्षा पूरी की है। हमारे कई छात्र भारी चुनौतियों के बावजूद स्वतंत्र और गरिमापूर्ण जीवन जी रहे हैं।
सफल उम्मीदवारों में तंज़ीला शामिल हैं जिन्होंने 454 अंक हासिल किए हैं। इसके अलावा आबिद ने 453, सीरत ने 450, मोहम्मद उमाक ने 438, बुरहान ने 418, मुस्कान ने 419 और तौहीदा ने 415 अंक हासिल किए। बता दें कि इनमें से ज्यादातर ने शुरू में सामान्य स्कूलों में दाखिला लिया था लेकिन संचार बाधाओं, साथियों और शिक्षकों से समझ की कमी और उचित सीखने के उपकरणों की अनुपस्थिति के कारण उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
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इन छात्रों ने बताया कि उन्हें सामान्य स्कूलों में बहुत संघर्ष करना पड़ा। अभिनंदन होम में शामिल होने के बाद ही हमें सच में महसूस हुआ कि हमें समझा और सपोर्ट किया जा रहा है। प्रिंसिपल ने बताया कि छात्रों ने कहा कि ब्रेल टेक्स्ट बुक, बड़े प्रिंट वाली स्टडी मटीरियल, साइन-लैंग्वेज पर आधारित पढ़ाई और खास तौर पर ट्रेंड टीचर्स की उपलब्धता ने उनकी एकेडमिक सफलता में अहम भूमिका निभाई। एक दिव्यांग छात्र को दूसरों के मुकाबले दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। छात्रों की सफलता में जितना स्कूल का हाथ है उतना ही उनके माता-पिता और शिक्षकों का भी है।
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