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ऑपरेशन मेघदूत: बाना टॉप तक बिखरी है साहस और शाैर्य की गाथा, जहां सांस लेना भी चुनौती, वहां लहराता है तिरंगा

Mon, 13 Apr 2026 10:54 AM IST
Nikita Gupta जैनब संधू, संवाद न्यूज एजेंसी, लेह

सार

सियाचिन दिवस पर ऑपरेशन मेघदूत की सफलता को याद करते हुए सियाचिन बेस कैंप में सैनिकों के साहस और बलिदान को सम्मानित किया जाएगा।
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सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते सेना के जवान । - फोटो : सेना
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विस्तार
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सियाचिन बेस कैंप पर सियाचिन दिवस आज देशभक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यह दिन भारत के सैन्य इतिहास की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक ऑपरेशन मेघदूत की याद में मनाया जाता है।

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सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते सेना के जवान । - फोटो : सेना
बाल्टी भाषा में सिया का अर्थ गुलाब और चेन का अर्थ बहुतायत होता है लेकिन आज यह ‘गुलाबों की जगह’ बर्फ, संघर्ष और सतत सैन्य सतर्कता के बीच दब चुकी है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, पूर्व सैनिक और जवान भाग लेंगे। इसमें पुष्पांजलि समारोह, संवाद सत्र, चिकित्सा शिविर और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में तैनात सैनिकों के साहस और बलिदान को सम्मान दिया जा सके।
 

सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते सेना के जवान । - फोटो : सेना
हर साल 13 अप्रैल को मनाया जाने वाला सियाचिन दिवस 1984 में ऑपरेशन मेघदूत की सफलता का प्रतीक है जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान के ऑपरेशन अबाबील से पहले पहुंचकर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण स्थापित किया। इस अभियान ने साल्टोरो रिज के साथ बिलाफोंड ला और सिया ला जैसे महत्वपूर्ण दर्रों पर भारत की पकड़ सुनिश्चित की और पाकिस्तान की मंशा को विफल कर दिया।

सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते सेना के जवान । - फोटो : सेना
सियाचिन की वीरता गाथाओं में कायद पोस्ट जो आज बाना टॉप के नाम से जानी जाती है की जीत एक ऐतिहासिक अध्याय है। परमवीर चक्र विजेता बाना सिंह ने इस साहसिक मिशन का नेतृत्व किया और अपने अनुभव साझा करते हुए विनम्रता और दृढ़ता का परिचय दिया। बातचीत में बाना सिंह ने कहा, यह देश की जीत है, मेरी नहीं। सेना में हमेशा करो या मरो की भावना रहती है। हम 24 घंटे देश के लिए तैयार रहते हैं। हम सेना में पीछे हटने या मुंह मोड़ने के लिए नहीं आते। यह हर सैनिक का कर्तव्य है।
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सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते सेना के जवान । - फोटो : सेना
60 डिग्री पारे में देश की रक्षा कर रहे सैनिक
आज सेना इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है और इतनी ऊंचाई पर सैनिकों और भारी उपकरणों की तैनाती करने वाली दुनिया की एकमात्र सेना है। यहां तैनात सैनिक माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक गिरते तापमान, हिमस्खलन और गंभीर ऊंचाई से जुड़ी बीमारियों जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद सेना ने विशेष कपड़ों, बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स में उल्लेखनीय प्रगति की है। चीता और ध्रुव हेलिकॉप्टर कठिन मौसम में भी आपूर्ति बनाए रखते हैं, जबकि स्मार्ट सोलर ग्रिड जैसी तकनीकें ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती हैं।

पर्यावरण संरक्षण के तहत ग्लेशियर से निकलने वाले कचरे को नुब्रा घाटी के पार्टापुर में रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है और डीआरडीओ के सहयोग से बायोडिग्रेडेबल समाधान विकसित किए जा रहे हैं। इस प्रकार, सियाचिन दिवस केवल एक स्मरण नहीं बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदर्शिता, सैन्य क्षमता और सबसे बढ़कर उसके सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान का जीवंत प्रतीक है जो मानव सहनशक्ति की सीमाओं पर खड़े होकर देश की रक्षा कर रहे हैं।
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