उद्यान विभाग के अनुसार दक्षिण कश्मीर के शोपियां के ऊपरी इलाके हीरपोरा, केलर, जैनपोरा और कुलगाम के डीएच पोरा व फ्रिसल में मई-जून की बेमौसम ओलावृष्टि और तेज हवा से फसल को 45 से 55 प्रतिशत तक का नुकसान हुआ। बडगाम के खानसाहिब, चरार-ए-शरीफ और पुलवामा के त्राल व राजपोरा के पारंपरिक बागानों में परागण के समय लगातार बारिश और कम धूप के कारण फल तेजी से गिरे। इससे पैदावार आधी रह गई। वहीं, कुपवाड़ा और बारामुला के ऊंचाई वाले इलाके और उत्तरी कश्मीर में तापमान में अचानक गिरावट से फलों का आकार और वजन दोनों प्रभावित हुआ।
घाटी की लगभग आधी आबादी सेब की बागवानी पर निर्भर है। ऐसे में उत्पादन में आई गिरावट ने न केवल बागवानों को आर्थिक रूप से झटका दिया है, बल्कि इससे जुड़े ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग और स्थानीय श्रम बाजार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। बागवान संगठनों ने प्रशासन से प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का जमीनी सर्वे कराकर तत्काल राहत पैकेज और पैकेजिंग सामग्री पर सब्सिडी देने की मांग की है।
उत्तरी कश्मीर ने दी बेहतर फसल
उत्तरी कश्मीर के बारामुला के मैदानी इलाके सोपोर के मुख्य बागान और रफियाबाद की तलहटी में मौसम का मिजाज अपेक्षाकृत स्थिर रहा। यहां पारंपरिक किस्मों में गिरावट 15 से 20 प्रतिशत तक ही सीमित रही। वहीं हाई डेंसिटी क्लस्टर्स पुलवामा, श्रीनगर के बाहरी क्षेत्रों और अनंतनाग में जिन बागवानों ने उच्च घनत्व वाली किस्में जैसे गाला, रेड वेलॉक्स और जेरोमाइन लगाई थीं, साथ ही एंटी हेल नेट का उपयोग किया था, वहां पैदावार सामान्य के करीब और फलों की गुणवत्ता उत्कृष्ट रही।
बागवान बोले- दाम बढ़े, लेकिन लागत निकालना भी मुश्किल
शुरुआती दौर में जब मौसम बिगड़ा तभी हमें आशंका थी कि फसल कम होगी। शोपियां के ऊपरी इलाकों में ओलावृष्टि ने रही-सही कसर पूरी कर दी। हमारे बाग में पिछले साल करीब 1,400 पेटियां तैयार हुई थीं, लेकिन इस बार मुश्किल से 750 पेटियां ही निकल रही हैं। खाद, कीटनाशक, पेटी-गत्ता और मजदूरी का खर्च दोगुना हो चुका है। मंडी में अच्छे सेब के भाव भले 1,100 से 1,300 रुपये प्रति पेटी मिल रहे हों, लेकिन जब पेड़ पर फल ही आधे रह गए तो मुनाफा कहां से बचेगा। - बशीर अहमद मीर, बागान मालिक, शोपियां
जिन किसानों ने हाई डेंसिटी पौधों के साथ नेट लगाए थे वे तो बच गए, लेकिन हमारे जैसे पारंपरिक बागवान पूरी तरह मौसम की दया पर हैं। हमारी आधी फसल प्रभावित हो चुकी है, जिसे स्थानीय स्तर पर औने-पौने दामों में बेचना पड़ रहा है। सरकार को चाहिए कि मौसम आधारित फसल बीमा योजना को जमीनी स्तर पर अनिवार्य और सुलभ बनाए। -गुलाम हसन डार, बागान मालिक, पुलवामा
मांग बरकरार, लेकिन आपूर्ति की भारी किल्लत
इस बार मंडियों में रोजाना आने वाली गाड़ियों की संख्या कम है। सोपोर और रफियाबाद के निचले इलाकों से तो कुछ हद तक माल आ रहा है, लेकिन शोपियां और कुलगाम की ओर से ए ग्रेड माल की भारी कमी है। बाहरी राज्यों-विशेषकर दिल्ली, मुंबई, गुजरात और पंजाब के व्यापारियों से सेब की मांग बनी हुई है, लेकिन हमारे पास भेजने के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण फल नहीं है। टर्नओवर घटने से व्यापारियों और आढ़तियों के कमीशन पर भी सीधा असर पड़ा है। -हाजी मुश्ताक अहमद, फल व्यापारी व आढ़ती, सोपोर फ्रूट मंडी
बाजार का समीकरण पूरी तरह आपूर्ति पर निर्भर है। हिमाचल में भी इस बार मौसम से फसल प्रभावित रही है, इसलिए कश्मीरी सेब को बाजार में शुरुआती गति मिली। हालांकि, हाईवे की स्थिति और लॉजिस्टिक्स खर्च में वृद्धि ने माल ढुलाई को महंगा कर दिया है। अगर आगामी हफ्तों में हाईवे सुचारू रहता है तो कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर स्टोर्स में माल स्टॉक करने वाले व्यापारियों को आगे बेहतर दरों की उम्मीद रहेगी। -मोहम्मद अल्ताफ, फल व्यापारी, परिम्पोरा मंडी, श्रीनगर