पर्रा ने कहा कि 1987 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में हुई भारी धांधली की वजह से राज्य में उग्रवाद का दौर शुरू हुआ, जिसमें अब तक लगभग एक लाख लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं। उस दौर की युवा पीढ़ी, जिसमें यासीन मलिक और बडगाम से उम्मीदवार रहे मोहम्मद यूसुफ शाह शामिल थे, ने निष्पक्ष चुनाव और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए थे, लेकिन जब लोकतांत्रिक रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए गए और असंतोष को दबाया गया, तो उसके गंभीर परिणाम के रूप में आतंकवाद पनपा और उम्मीदवारों को सलाहुद्दीन जैसी राह पर धकेल दिया गया।
उन्होंने कहा कि कश्मीरी अवाम से बेहतर लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की अहमियत कोई नहीं समझ सकता क्योंकि यहां के लोगों ने लोकतांत्रिक अधिकारों के छिनने की भारी कीमत चुकाई है। 1987 से लेकर अब तक जब भी यहां के युवाओं ने निष्पक्ष चुनाव और अपने अधिकारों की मांग की, उन्हें देशद्रोही करार देकर दबाने की कोशिश की गई।
वहीद पर्रा ने केंद्र सरकार से ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने और 1987 के चुनाव में हुई वोट चोरी के लिए माफी मांगने की बात दोहराते हुए कहा कि कश्मीर के लोगों को लोकतांत्रिक आजादी और सहानुभूति मिलनी चाहिए।