फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मौसम का असर: भूस्खलन तो कहीं बाढ़, श्रीनगर में झेलम का जलस्तर दो फीट से कम, 1934 के बाद सितंबर सबसे अधिक गर्म

Wed, 20 Sep 2023 04:07 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर

सार

जम्मू संभाग के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में आए दिन जहां भूस्खलन और बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है, तो वहीं कश्मीर संभाग में कुछ महीनों से न के बराबर बारिश होने से सूखे की स्थित है।
विज्ञापन
झेलम नदी का जलस्तर हुआ कम - फोटो : बासित जरगर
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

झेलम नदी को न केवल कश्मीर की जीवन रेखा माना जाता है, बल्कि इसका समृद्ध और जीवंत इतिहास भी है। हालांकि इस वर्ष यहां के मौसम में बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ जम्मू संभाग के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में आए दिन जहां भूस्खलन और बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है, तो वहीं कश्मीर संभाग में कुछ महीनों से न के बराबर बारिश होने से सूखे की स्थित है। इसका उदाहरण दक्षिण कश्मीर से उत्तर की ओर बहने वाली प्रसिद्ध झेलम नदी है, जिसकी तलहटी में दरारें पड़ गई हैं।

विज्ञापन

जानकारों के अनुसार कश्मीर की जीवन रेखा कहलाने वाली झेलम नदी पिछले 70 वर्षों में सितंबर के महीने में अब तक के सबसे कम जलस्तर पर है। वर्तमान में श्रीनगर में नदी का जलस्तर दो फीट से भी कम है। यह आने वाले समय के लिए चिंता का विषय है। अगर बारिश नहीं हुई, तो इसका प्रभाव खेतीबाड़ी के साथ साथ जनजीवन पर पड़ेगा।

मौसम विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस साल घाटी में सितंबर सबसे खुश्क रहा है। सितंबर महीने में 1934 के बाद इस साल दूसरी बार सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया। ऐसा लंबे समय तक खुश्क मौसम के कारण हुआ। पर्यावरण विशेषज्ञ एजाज रसूल ने कहा, कुदरत के साथ छेड़खानी काफी समय से हो रही है। झेलम का जलस्तर पिछले 70 सालों में पहली बार इतना कम है। 
विज्ञापन

बारिश का हाल भी इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं रहा। इसे हम ग्लोबल वार्मिंग या क्लाइमेट चेंज कहते हैं। यानी असमय किसी चीज का ज्यादा हो जाना। इसमें या तो सर्दी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है या फिर गर्मी का अहसास ज्यादा बढ़ जाता है। इसी तरह कभी सैलाब आ जाना तो कहीं सूखा पड़ना। इस क्लाइमेट चेंज का असर हिमालय पर ज्यादा पढ़ रहा है।

इस क्लाइमेट चेंज के चलते मौसम में समानता नहीं रहती है। हाइड्रोलॉजिकल साइकिल में बैलेंस नहीं रहता है। इस पर 20 देशों ने बैठकें भी की हैं, जिसमें कहा कि हम 2030 तक अपने देशों के तापमान को डेढ़ सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान को बढ़ने नहीं देंगे। इसके लिए सब उचित कदम उठाएंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी इन देशों द्वारा ऐसा कोई प्रयास नहीं देखा गया है। 

केवल संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इस बात पर सहमति बनाई गई कि समुद्र में प्लास्टिक वेस्ट को रोका जाए, क्योंकि यह भी क्लाइमेट चेंज का एक बड़ा कारण है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में दिक्कतें बढ़ सकती हैं। खासकर पीने के पानी के लिए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें