श्रीनगर। कश्मीर घाटी में इन दिनों सेब और मक्के की फसल तैयार होने के साथ ही जंगली जानवरों, विशेष रूप से भालुओं के हमलों में चिंताजनक उछाल देखा जा रहा है। जंगलों से सटे रिहायशी इलाकों, सेब के बगीचों और कृषि क्षेत्रों में काम करने वाले स्थानीय लोगों और किसानों में भारी दहशत फैल गई है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीते दो वर्षों के भीतर जम्मू-कश्मीर में जंगली जानवरों के हमलों की कुल 15,661 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 32 लोगों ने अपनी जान गंवाई है जबकि 350 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। अधिकांश घटनाएं सुबह के समय सामने आ रही हैं, जब लोग अपने खेतों और बगीचों में दैनिक कामकाज के लिए निकलते हैं।
कुलगाम जिले के दमहल हांजीपोरा स्थित अहमदाबाद गांव के 62 वर्षीय किसान अब्दुल सलाम हाल ही में हुए एक हमले में बाल-बाल बचे हैं। सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे जब वह अपनी पत्नी और बहू के साथ सेब के बगीचे में पहुंचे तो उन्हें पास ही किसी अन्य व्यक्ति पर भालू के हमले की चीखें सुनाई दीं। भागने की कोशिश के दौरान भालू ने अचानक उन पर झपट्टा मारकर उनके सिर को गंभीर रूप से घायल कर दिया। वह मंजर इतना भयानक था कि लगा जैसे दिल का दौरा पड़ गया हो। उन्हें और पास में घायल हुए एक अन्य ग्रामीण को तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार चल रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023–24 के दौरान केंद्र शासित प्रदेश में कुल 9,301 हमले दर्ज किए गए। इनमें 18 लोगों की मौत हुई और 137 लोग घायल हुए। इस अवधि में सर्वाधिक 1,444 हमले जम्मू जिले में और 1,173 हमले उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में दर्ज किए गए। इसके बाद वर्ष 2024–25 में कुल 6,360 हमलों की पुष्टि हुई। इनमें 14 लोगों की जान गई और 213 नागरिक घायल हुए। इस दूसरे वर्ष में भी जम्मू, रामबन, किश्तवाड़, अनंतनाग और डोडा जिले सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहे।
वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का मानना है कि मानव-भालू संघर्ष में आई इस तेजी के पीछे प्राकृतिक आवासों में इंसानी दखल और मौसमी भोजन की आसान उपलब्धता सबसे प्रमुख वजह है। वर्तमान में सेब और मक्के की कटाई का समय चल रहा है। इसकी महक और आसानी से मिलने वाला भोजन भालुओं को जंगलों से बस्तियों की ओर आकर्षित करता है।
इसके अतिरिक्त पारंपरिक चरागाहों और जंगलों से सटी जमीनों का अंधाधुंध कृषि या रिहायशी उपयोग में बदलना और खुले में कचरा फेंकना इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल हमलों की संख्या के आधार पर भालुओं की आबादी बढ़ने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए ‘एशियाई ब्लैक बियर’ की ठोस वैज्ञानिक गणना जरूरी है।