श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास शांति और स्थिरता का एक नया दौर शुरू हो चुका है। जिन सीमांत इलाकों में कभी सीमा पार से होने वाली गोलाबारी के चलते बारूद की गंध फैली रहती थी, आज वे इलाके अमन और खुशबू महसूस कर रहे हैं। दशकों तक तनाव और प्रतिबंधों के साए में रहे सीमावर्ती गांव अब सैलानियों की चहल-पहल से गुलजार हैं। केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की साझा कोशिशों के चलते सीमा पर्यटन यानी बॉर्डर टूरिज्म आज इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सीमांत क्षेत्रों के स्थानीय युवाओं को रोजगार प्रदान करना, वहां के आर्थिक परिदृश्य को मजबूत करना और देश भर से आने वाले पर्यटकों को सीमा पार का जीवन और सौंदर्य दिखाना है।
कश्मीर घाटी की बात करें तो सरकार ने उत्तर कश्मीर के उन सुदूर इलाकों को आम पर्यटकों के लिए खोल दिया है, जहां जाने के बारे में कुछ साल पहले तक आम नागरिक सोच भी नहीं सकते थे। कुपवाड़ा और बांदीपोरा जिले की केरन घाटी, तंगधार, मच्छिल और गुरेज घाटी जैसे सुरम्य स्थल अब देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटकों के पसंदीदा ठिकाने बन गए हैं। दशकों से प्रतिबंधित रहे इन गांवों में सुरक्षा माहौल सुधरने से पर्यटकों का भारी हुजूम उमड़ रहा है।
इसी तरह उड़ी सेक्टर के सलामाबाद में स्थित पूर्व व्यापार सुविधा केंद्र का भी कायाकल्प किया जा रहा है। नियंत्रण रेखा के पार होने वाला व्यापार बंद होने के सात साल बाद अब इस विशाल केंद्र को पर्यटन विभाग को सौंप दिया गया है। विभाग इसे एक प्रमुख बॉर्डर टूरिज्म हब के रूप में विकसित कर रहा है, जहां एलओसी साइटसीइंग और पर्यटकों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इसके अलावा जम्मू की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुचेतगढ़ में वाघा बॉर्डर की तर्ज पर 'रिट्रीट सेरेमनी' का आयोजन हो रहा है और सांबा सेक्टर में बाबा चमलियाल मंदिर क्षेत्र को टूरिस्ट सर्किट से जोड़कर नई पहचान दी गई है।
- स्थानीय रोजगार और ट्राइबल 'होमस्टे' क्रांति
बॉर्डर टूरिज्म का सबसे बड़ा और सकारात्मक प्रभाव स्थानीय युवाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। 'कम्युनिटी बेस्ड टूरिज्म' और 'अनुभवजन्य पर्यटन' को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर होमस्टे पंजीकृत किए गए हैं। इससे अब तक 2,000 से अधिक स्थानीय परिवारों को सीधे तौर पर आतिथ्य क्षेत्र से जोड़ा जा चुका है। सैलानी अब इन गांवों में रहकर वहां की पारंपरिक संस्कृति, स्थानीय भोजन और जीवनशैली का सीधा अनुभव ले रहे हैं।
इस पहल को और मजबूती देने के लिए केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने ट्राइबल इको-टूरिज्म प्रोग्राम के तहत एक विशेष कदम उठाया है। गुरेज घाटी के तीन गांवों—इज़मर्ग, चोरवन और शेखपोरा में हाल में 15 पहाड़ी व ट्राइबल परिवारों के घरों को आधुनिक होमस्टे में बदला जा रहा है। सरकार आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार के नए साधन तैयार हो रहे हैं।
इसके अलावा मच्छिल सेक्टर में भी होम स्टे शुरू हो चुके हैं। इलाके के सरपंच हबीबुल्ला ने बताया कि जब से सेना और स्थानीय प्रशासन ने बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा देना शुरू किया है तब से यहां होम स्टे की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। पहले इलाके में 4-5 होम स्टे थे लेकिन अब संख्या करीब 20 से ऊपर पहुंच चुकी है। इससे स्थानीय युवाओं को भी अपने ही इलाको में रोजगार मिल रहा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने बॉर्डर टूरिज्म को प्रोमोट करने के लिए सेना के योगदान की सरहाना की।
सुगम आवाजाही और बुनियादी ढांचे का विकास
पहले सीमावर्ती संवेदनशील इलाकों में जाने के लिए नागरिकों और पर्यटकों को बेहद कठिन परमिट प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। सरकार ने इस समस्या का स्थायी समाधान निकालते हुए डिजिटल पोर्टल और सिंगल-विंडो सिस्टम तैयार किया है, जिससे सैलानी घर बैठे आसानी से ई-परमिट प्राप्त करके सीमांत गांवों की यात्रा कर सकते हैं।
इसके साथ ही बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए ऑल-वेदर रोड कनेक्टिविटी पर काम चल रहा है। 'सद्भावना प्रोजेक्ट्स' और 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' के तहत सड़कों का चौड़ीकरण किया गया है, जिससे यात्रा अब पहले से कहीं अधिक आरामदायक और सुगम हो गई है। डिजिटल कनेक्टिविटी के मामले में भी अंतिम गांव तक जियो और बीएसएनएल के जरिए 4G और 5G नेटवर्क के साथ-साथ वाई-फाई सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। केरन घाटी के सक स्थानीय नसीम दुर्रानी ने बताया कि उनका इलाका केवल 50-70 मीटर की दूरी पर है पाक अधिकृत कश्मीर की नीलम घाटी से, बीच में किशनगंगा नदी बहती है। इस इलाके में आना पहले एक सपना सा होता था लेकिन आज यहां काफी संख्या में पर्यटक आते हैं। पर्यटन के साथ साथ यहां रोजगार बढ़ रहा है।
- भारतीय सेना का सहयोग और पर्यटकों की रिकॉर्ड आवाजाही
स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग के साथ मिलकर भारतीय सेना 'ऑपरेशन सद्भावना' के तहत बॉर्डर फेस्टिवल, ट्रेकिंग कैंप और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। सेना के जवान न केवल पर्यटकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं, बल्कि सुरक्षा और प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं में भी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
इन समन्वित प्रयासों का परिणाम आंकड़ों में साफ नजर आ रहा है। अकेले गुरेज घाटी में बीते छह महीनों के भीतर रिकॉर्ड 1.5 लाख से अधिक पर्यटकों ने दस्तक दी है, जिससे वहां के होटलों, होमस्टे, टेंट संचालकों, ट्रांसपोर्टरों और छोटे व्यापारियों के चेहरे खिल उठे हैं। गुजरात, मुंबई और देश के अन्य हिस्सों से पहुंचे सैलानियों का मानना है कि केरन और गुरेज की नैसर्गिक सुंदरता और शांत माहौल का मुकाबला देश का कोई अन्य पर्यटन स्थल नहीं कर सकता। कुल मिलाकर, कश्मीर के सीमांत इलाके अब बारूद के साए से पूरी तरह बाहर निकलकर शांति, समृद्धि और वैश्विक पर्यटन के एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं।
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