श्रीनगर/शोपियां। घाटी के पर्वतीय ढलानों और बगीचों में सेब की तुड़ाई के साथ-साथ अब अखरोट की कटाई, छंटाई और व्यापार भी पूरे शबाब पर पहुंच चुका है। दक्षिण कश्मीर के शोपियां समेत अन्य उत्पादक जिलों में पारंपरिक सूखे मेवों की खुशबू बिखरने लगी है और मंडियों में खरीदारों की बढ़ती दिलचस्पी ने किसानों के चेहरों पर चमक बिखेर दी है। एक हालिया शोध ने इस बात की तस्दीक की है कि कश्मीर में अखरोट की खेती आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद मुफीद और लाभकारी साबित हो रही है। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि अखरोट की बागवानी में लागत और लाभ का अनुपात एक अनुपात 5.35 दर्ज किया गया है, यानी किसान द्वारा जमीन में लगाए गए प्रत्येक एक रुपये के बदले उसे पांच रुपये पैंतीस पैसे का शानदार रिटर्न मिल रहा है।
दक्षिण कश्मीर के चार प्रमुख जिलों अनंतनाग, पुलवामा, कुलगाम और शोपियां के 240 उत्पादकों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि प्रति हेक्टेयर लगभग अस्सी पेड़ों वाले बागीचे से करीब 3560 किलो से अधिक पैदावार हासिल की जा सकती है। इतने रकबे पर करीब 83825 की लागत आती है, जिसके मुकाबले किसानों को लगभग 5.31 लाख रुपये की सकल आय और करीब 4.48 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा प्राप्त होता है। हालांकि इस बंपर मुनाफे की चमक के पीछे कुछ जमीनी हकीकतें भी छिपी हैं। उत्पादन की कुल लागत का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा अकेले मानव श्रम पर खर्च हो जाता है। पेड़ों से अखरोट तोड़ना, जमीन से चुगना, बागीचों की पहरेदारी करना और तुड़ाई के बाद की लंबी प्रक्रिया पूरी तरह शारीरिक मेहनत पर टिकी है, जिससे मजदूरों की अनुपलब्धता या बढ़ती मजदूरी किसानों के मुनाफे पर सीधा असर डालती है।
तकनीकी प्रशिक्षण और संस्थागत ऋण की भारी कमी
इसके साथ ही बाजार में मिलने वाली दरों में गुणवत्ता के आधार पर भारी अंतर देखा जाता है। छिलके की मजबूती, गिरी के रंग, स्वाद और नमी के स्तर के मुताबिक उत्पादकों को 100 रुपए से लेकर 165 रुपये प्रति किलो तक के भाव मिलते हैं। फसल की उत्पादकता खाद, उर्वरकों के इस्तेमाल, पेड़ों के घनत्व, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और कृषि संबंधी सूचनाओं तक किसानों की पहुंच पर काफी हद तक निर्भर करती है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तकनीकी प्रशिक्षण, कृषि विस्तार सेवाओं और संस्थागत ऋण की भारी कमी बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को वैज्ञानिक पद्धतियों और आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाए, तो यह पारंपरिक क्षेत्र और अधिक फल-फूल सकता है।
वोट, ब्रज़ेल और सफ गोज वाला डून की भारी मांग
मौजूदा वक्त में शोपियां के ग्रामीण इलाकों में यह कारोबार परिवारों की आजीविका की रीढ़ बना हुआ है। स्थानीय किसान और व्यापारी न सिर्फ अपने बगीचों की फसल सहेज रहे हैं, बल्कि छोटे उत्पादकों से भी माल खरीदकर धोते, सुखाते और तैयार करते हैं। इस मौसमी काम में परिवारों की नई पीढ़ी भी हाथ बंटा रही है। बाजार में वोट, ब्रज़ेल और सफ गोज वाला डून जैसी स्थानीय किस्मों की भारी मांग है, जिससे किसानों को इस साल वाजिब दाम मिल रहे हैं। सेब और अखरोट के इस दोहरे मौसमी व्यापार ने घाटी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है, जिससे बागवानों और व्यापारियों दोनों के लिए आजीविका के मजबूत रास्ते खुल रहे हैं।