बांदीपोरा। एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में शुमार वुलर झील के किनारे अब गुलाबी कमल की खेती किसानों के लिए आजीविका का एक नया जरिया बनकर उभर रही है। कृषि विज्ञान केंद्र (केविके)के प्रयासों से बंजर और दलदली भूमि को आय के साधन में बदलने की पहल को बड़ी सफलता मिली है।
परियोजना का मुख्य उद्देश्य वेटलैंड संरक्षण के साथ-साथ जलीय फसलों की खेती को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदाय की आमदनी बढ़ाना है। वुलर के किनारों पर खिलते गुलाबी कमल न केवल झील की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं, बल्कि इससे क्षेत्र में पर्यावरण-पर्यटन (इको-टूरिज्म) और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।
केविके के प्रभारी डॉ. तारिक सुल्तान ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन का जोर इस बात पर रहा है कि बंजर और दलदली जमीन का उपयोग जलीय फसलों की खेती और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रोसेसिंग के लिए किया जाए।
उन्होंने कहा कि दो साल पहले केविके ने गुलाबी कमल की खेती का सफल परीक्षण कर किसानों को इसकी आधुनिक तकनीक सिखाई थी। स्थानीय किसानों ने इसमें गहरी रुचि दिखाई है। अब बड़ी संख्या में किसान अपने दलदली खेतों में कमल की खेती अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।
जानकारों का मानना है कि यह पहल किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करने के साथ-साथ वूलर वेटलैंड के सतत उपयोग और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में भी बेहद मददगार साबित होगी।