श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने वीरवार को एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि आज भी समाज के एक हिस्से में विवाह से पहले बच्चे को जन्म देना कलंक माना जाता है।
न्यायमूर्ति संजीव कुमार की पीठ ने मेडिकल बोर्ड द्वारा दी गई रिपोर्ट के अवलोकन के बाद कहा, कि इससे यह स्पष्ट है कि न केवल एक चिकित्सक बल्कि डॉक्टरों के एक बोर्ड ने नाबालिग के गर्भ को समाप्त करने की सिफारिश की है। यह स्पष्ट है कि यदि अवयस्क की गर्भावस्था को जल्द से जल्द समाप्त नहीं किया जाता है, तो यह चिकित्सा और अन्य समस्याओं को कई गुना बढ़ा देगा। अदालत ने कहा कि ऐसी अवस्था में बच्चा पैदा हुआ तो उसका बाकी जीवन काफी परेशानियों से भरा होगी। दुर्भाग्य से नाबालिग दुष्कर्म के बाद गर्भवती हुई है। समाज में आज भी शादी से पहले बच्चे को जन्म देना एक कलंक माना जाता है।
दुष्कर्म पीड़िता ने अदालत में पिता के माध्यम से 13 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति के लिए अदालत से हस्ताक्षेप की मांग की थी। अदालत ने पिछले हफ्ते संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वह 15 दिसंबर को गठित डॉक्टर्स बोर्ड से तुरंत उसकी जांच कराएं। अदालत ने अधिकारियों से बोर्ड की राय को ध्यान में रखते हुए नाबालिग लड़की के अनचाहे गर्भ को खत्म करने के संबंध में फैसला लेने के लिए कहा था।
अदालत ने कहा कि परिस्थितियों की समग्रता को ध्यान में रखते हुए सभी पक्षों (संबंधित सीएमओ और अन्य) को गर्भपात के बाद पीड़िता की उचित देखभाल करने और आवश्यक चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन करने का निर्देश भी दिया।
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छह सप्ताह में सरकार जवाब दाखिल करे
अदालत ने कहा कि अदालत के हस्तक्षेप के बिना राज्य को ऐसी स्थितियों में कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए, इस बारे में अधिकारियों को अपना विस्तृत जवाब छह सप्ताह में दाखिल करना चाहिए।