कश्मीर घाटी में श्रीनगर का दिल कहे जाने वाले ऐतिहासिक लाल चौक में बिजली के पहले बल्ब की रोशनी का इतिहास बेहद दिलचस्प है। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से वर्ष 1902 में टरबाइन भारत लाई गईं। बनिहाल कार्ट रोड (मौजूदा जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे) पर तांगे से मशीनें कश्मीर पहुंचाई गईं।
अफगानिस्तान, बाल्टिस्तान, लद्दाख और पंजाब से आए श्रमिकों ने 11 किलोमीटर लंबी लकड़ी की नहर बनाई और तीन साल में एशिया की दूसरी सबसे पुरानी चार मेगावाट क्षमता की मोहरा पनबिजली परियोजना का सपना साकार कर दिया। इस तरह से जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले में एलओसी से सटे मोहरा गांव में इंजीनियरिंग की इस नजीर से लाल चौक पर करीब 120 साल पहले बिजली का पहला बल्ब जला था।
दरअसल, तत्कालीन महाराजा प्रताप सिंह कश्मीर में रेल परियोजना लाना चाहते थे। उसके लिए बिजली की जरूरत महसूस की गई। मैसूर में वहां के राजा ने एशिया की पहली पनबिजली परियोजना तैयार करवाई। वहीं, इंजीनियर लाकर महाराजा प्रताप सिंह ने कश्मीर में सर्वे करवाया। वर्ष 1902 में मोहरा गांव को परियोजना के लिए चुना गया। बोनियार से नदी का पानी मोहरा तक पहुंचाना था, जिसके लिए लकड़ी की नहर तैयार कर 1905 में परियोजना से बिजली बनने लगी।
वर्ष 1996 से यह परियोजना ठप पड़ी है। लकड़ी की नहर के अवशेष आज भी हर देखने वाले को हैरत में डाल देते हैं। जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन के एक वरिष्ठ इंजीनियर ने बताया कि इस धरोहर परियोजना को पुनर्जीवित करने के लिए 133 करोड़ मंजूर हुए हैं, जिसके लिए जल्द काम शुरू होगा।
चार इंच मोटे फट्टे लगाए जूट से भरी जाती थीं दरारें
बिजली परियोजना की नहर के रखरखाव में काम कर चुके सेवानिवृत्त कर्मी अब्दुल रशीद खान ने बताया कि 8.5 फुट ऊंची और 8.5 फुट चौड़ी लकड़ी की नहर के लिए 300 कर्मचारी तीन शिफ्टों में काम करते थे। नहर में 7.2 फुट तक पानी का स्तर रखकर 200 क्यूसेक्स पानी का बहाव कायम रखना होता था। बोनियार से मोहरा पावर स्टेशन तक लकड़ी की नहर को चार इंच मोटे फट्टे लगाकर तैयार किया गया। फट्टों की दरारें जूट से भरीं जाती थीं। इस पानी से बिजली बनाने के साथ ही हजारों एकड़ जमीन को सिंचाई का पानी भी मिलता था।
बिजली ने बढ़ाया दुनिया के सबसे बड़े रेशम कारखाने का उत्पादन
मोहरा परियोजना से बिजली महाराजा के महल समेत श्रीनगर स्थित दुनिया के सबसे बड़े रेशम कारखाने को भी सप्लाई होती थी। बिजली से उत्पादन बढ़ गया। तब रेशम कारखाने में 3300 कर्मचारी हर साल 100 टन रेशम तैयार करते थे।