1947 में दराल किला बचाने के लिए पाकिस्तानी हमलावरों से भिड़ गए थे जत्थेदार राम सिंह के साथ 50 नागरिक
संवाद न्यूज एजेंसीनौशेरा। दराल घाटी में चट्टान के ऊपर 12 फुट का स्मारक स्तंभ (शहीदगढ़ युद्ध स्मारक) हर साल 28 अक्तूबर को भावनाओं के समुद्र का गवाह बनता है, जिसे शहीदगढ़ दिवस के रूप में जाना जाता है। 1947 में जत्थेदार राम सिंह, सरदार हुकम सिंह, सोहन सिंह, सुचान सिंह, प्रीतम सिंह के साथ 50 नागरिकों के दल ने दराल किले का बचाव किया और आगे बढ़ रहे पाकिस्तानी हमलावरों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के नेतृत्व में भारतीय सेना के नौशेरा की रक्षा के लिए पहुंचने तक इन बहादुर नागरिकों ने दुश्मन के हमलों को नाकाम कर दिया।
इन बहादुरों के बलिदान का सम्मान करने के लिए ताइन राष्ट्रीय राइफल्स ने शनिवार को शहीदगढ़ दिवस मनाया। यह दिन स्थानीय लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन इन बहादुरों के वंशज पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और उनके बलिदान से प्रेरणा लेने के लिए शहीदगढ़ में इकट्ठा होते हैं। यह आयोजन क्षेत्र के स्थानीय लोगों के बीच देशभक्ति की भावना और राष्ट्रवादी उत्साह को प्रदर्शित करता है। शनिवार को कार्यक्रम की शुरुआत पुष्पांजलि के साथ हुई, जिसमें दो प्रमुख बाल सैनिक, सरदार बसंत सिंह, पूर्व होम जीडी सदस्य और सेवानिवृत्त हवलदार बलदेव सिंह ने शहीदों को पुष्प अर्पित किए। ये व्यक्ति मात्र किशोर थे, जब उन्होंने 1947 में भारतीय सेना की विभिन्न इकाइयों से संदेश पहुंचाने और उन्हें उद्देश्यों की ओर मार्गदर्शन करने में सहायता और मार्गदर्शन किया था। शहीदगढ़ गुरुद्वारा में प्रार्थना सभा करवाई गई, जिसमें युवाओं के बीच देशभक्ति की भावना पैरा करने और उन्हें इन बहादुर नागरिकों के वीरतापूर्ण कार्यों से राष्ट्रवादी भावनाओं को आत्मसात करने की शपथ दिलाई गई।