मौखिक इतिहास को दर्ज (रिकार्ड) करने की परंपरा को भी फिर से शुरू करने के भी निर्देश
- फोटो : Demo Pic.
वर्ष 1985 के बाद से अब तक कोई भी सरकारी दस्तावेज संग्रहीत नहीं किया गया है। यह जानकारी मिलने के बाद वित्त मंत्री डॉ. हसीब द्राबू स्तब्ध हैं। वित्त मंत्री ने इस पर हैरानी और चिंता जताते हुए सभी संबंधित विभागों को 1985 के बाद से लेकर अब तक के सभी कैबिनेट फैसलों को संग्रहीत करने के निर्देश जारी किए।
साथ ही उन्होेंने तत्काल प्रभाव से एक रूटीन बनाने के भी सख्त निर्देश जारी किए। शुक्रवार को उच्च प्रशासनिक अफसरों से बैठक के दौरान उन्होंने स्पष्टकिया कि सभी कैबिनेट फैसलों और संरचनात्मक फैसलों को हर हाल में संग्रहीत करना सुनिश्चित किया जाए। द्राबू ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि बीते 31 वर्षों से कोई भी सरकारी दस्तावेज संग्रहीत नहीं किया गया है।
बैठक के दौरान वित्त मंत्री ने लाइब्रेरी विभाग को श्रीनगर, जम्मू और लद्दाख में तीन संभागीय लाइब्रेरियां स्थापित करने के भी निर्देश दिए। साथ ही द्राबू ने अधिकारियों से सभी जिलों में एक लाइब्रेरी बनाने और सिविल समाज के सहयोग से पब्लिक लाइब्रेरियां खोलने के भी निर्देश जारी किए।
वित्तमंत्री ने जारी किए नए निर्देश
हसीब द्राबू जम्मू कश्मीर के वित्तमंत्री हैं।
- फोटो : Sanjay Gupta
हालांकि, वित्त मंत्री ने इस दौरान अधिकारियों को मुकम्मल नीति लागू होने तक एक भी किताब न खरीदने की भी सख्त हिदायत दी। उन्होंने साफ किया कि अगर एक भी किताब की खरीद की बात उन तक पहुंची तो संबंधित अधिकारी पर सख्त कार्रवाई होगी।
द्राबू ने बैठक के दौरान राज पत्रीय विभाग (स्टेट गैजेटर डिपार्टमेंट) को तत्काल प्रभाव से विद्वानों का एक संपादकीय बोर्ड गठित करने और झेलम वैली, चिनाब वैली, इंदस वैली, पीर पंजाल क्षेत्र और तवी बेसिन के लिए राज पत्र शुरू करने के निर्देश दिए।
उन्होंने मौखिक इतिहास को दर्ज (रिकार्ड) करने की परंपरा को भी फिर से शुरू करने के भी निर्देश दिए। द्राबू ने इसके लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता का आश्वासन देते हुए कहा कि एक राज पत्र के लिए वे दो करोड़ रुपये का फंड भी देने को तैयार हैं, पर गुणवत्ता के स्तर को सुधारना होगा।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि पता करें कि क्या कहां है, उसकी सत्यता जांचें ताकि हमें पता चले कि हमारे पास क्या है। इसके अलावा द्राबू ने व्यापक सांस्कृतिक नीति बनाने के भी निर्देश दिए ताकि रियासत में जीवंत सांस्कृतिक आंदोलन की शुरूआत की जा सके। द्राबू ने कहा कि हम सिर्फ स्मारकों और कब्रिस्तानों के संरक्षण में ही खुश हैं। उन्होंने संरक्षण नीति में भी बदलाव करने कोे प्रख्यात वास्तुविदों की मदद लेने को भी कहा।