कठुआ कांड पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की कमेटी ने नेशनल मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कमेटी ने अपनी 16 पेज की रिपोर्ट में कहा है कि मीडिया ने जम्मू, जम्मू के वकीलों ओर सिविल सोसाइटी के लोगों की गलत तस्वीर पेश की। मीडिया ने तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया कि वे सब आरोपियों को बचा रहे हैं। जबकि सच ये है कि वे पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे।
बीसीआई की कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जो रिपोर्ट सौंपी है, उसकी प्रति अमर उजाला के हाथ लगी है। रिपोर्ट के अनुसार नेशनल मीडिया ने पूरे एपिसोड को गलत तरीके से पेश किया। खासकर कठुआ बार एसोसिएशन तथा जम्मू बार एसोसिएशन से जुड़े वकीलों के व्यवहार को लेकर। मीडिया ने यह गलत तरीके से पेश किया कि कठुआ तथा जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन आरोपियों का पक्ष ले रही है। मीडिया ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के उस प्रेस विज्ञप्ति को भी प्रकाशित नहीं किया जिसमें उन्होंने सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कठुआ बार एसोसिएशन के लोगों ने किसी भी समय क्राइम ब्रांच को कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने से कभी भी नहीं रोका। साथ ही फाइनल रिपोर्ट दाखिल करने में भी किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुंचाई। कठुआ बार एसोसिएशन के किसी भी सदस्य ने न तो फाइनल रिपोर्ट के दस्तावेज को फाड़ा और न ही छीना। बार एसोसिएशन ने केवल क्राइम ब्रांच वापस जाओ के नारे लगाए और सीबीआई जांच की मांग की।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने नौ मार्च, 22 मार्च, तीन अप्रैल व सात अप्रैल को चार मांगों के संबंध में प्रस्ताव पारित किया जिसमें रसाना कांड की सीबीआई से जांच कराने की मांग भी शामिल थी। इन चार मांगों के संबंध में चार अप्रैल से कोर्ट के कामकाज से विरत रहने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। कमेटी में पूर्व जस्टिस तरुण अग्रवाल के नेतृत्व में आई इस कमेटी में एस प्रभाकरन (को- चेयरमैन, बार काउंसिल), रमेशचन्द्र जी शाह (को-चेयरमैन, बार काउंसिल), नरेश दीक्षित (एडवोकेट पटना हाईकोर्ट) व रजिया बेग (सदस्य-बार काउंसिल उत्तराखंड) शामिल थे।
तालिब हुसैन की विश्वसनीयता की जांच जरूरी
कमेटी के सामने तालिब हुसैन भी प्रस्तुत हुए जिन्होंने अपने को जनजातीय लोगों का सामाजिक कार्यकर्ता होने का दावा किया।हुसैन ने कहा कि वे क्राइम ब्रांच की जांच से संतुष्ट हैं। हालांकि, कमेटी ने यह इशारा किया कि कई दस्तावेज पेश किए गए हैं जिससे यह लगता है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है। इस वजह से उसकी विश्वसनीयता की जांच जरूरी है।
सिविल सोसाइटी ने भी सीबीआई जांच की मांग की
रिपोर्ट में कहा गया है कि कमेटी से मिलने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों ने कहा कि जनजातीय लोगों के साथ पिछले कई दशकों से वे भाईचारे के साथ रहते आए हैं। इसमें किसी को कोई परेशानी नहीं रही है। लेकिन हाल ही में 14 फरवरी को जनजातीय मामलों के विभाग की बैठक के मिनट्स में जनजातीय समुदाय के लोगों को संरक्षण देने से संबंधित आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि इस समुदाय के लोगों की ओर से जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने से पहले संबंधित जिला प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। सिविल सोसाइटी ने रोहिंग्याओं को हटाने की मांग की। साथ ही कहा कि क्राइम ब्रांच ने रसाना मामले की जांच काफी लापरवाही से की है। इसलिए इसकी जांच सीबीआई को सौंपी जाए।
सौ से अधिक महिला वकील भी मिली थीं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सहित सदस्यों ने कभी भी दीपिका रजावत समेत पीड़िता के किसी वकील को कोर्ट में उपस्थित होने से रोका नहीं। एसोसिएशन के अध्यक्ष सलाथिया हाईकोर्ट भवन में सीढ़ियों पर दीपिका रजावत से मिले थे और उन्हें बार के काम से विरत रहने के प्रस्ताव की जानकारी दी थी। इस पर दीपिका ने कहा था कि चूंकि वे बार की सदस्य नहीं हैं, इस वजह से वह बार के किसी प्रस्ताव को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
बार के कामकाज से विरत रहने के फैसले के बाद भी दीपिका कोर्ट में नौ व 11 अप्रैल को उपस्थित हुईं। इस दौरान उन्हें बार अध्यक्ष या किसी भी सदस्य ने नहीं रोका। दीपिका रजावत की ओर से पक्ष रखने के बाद हाईकोर्ट की ओर से निष्पक्ष निगरानी रखने की याचिका का अंतिम रूप से निस्तारण कर दिया गया। दीपिका रजावत की ओर से बार अध्यक्ष की ओर से धमकी दिए जाने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में 500 से अधिक महिला वकील हैं। कमेटी ने 100 से अधिक महिला वकीलों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि दीपिका रजावत को कभी भी बार अध्यक्ष या अन्य किसी सदस्य ने नहीं रोका। दीपिका से उनके संबंध अच्छे हैं और वह लेडीज रूम में साथ ही बैठकर सभी सुविधाओं का इस्तेमाल करती हैं।