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30 साल बाद तारबंदी के आगे 34 क्विंटल गेहूं का उत्पादन

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डेढ़ दशक के लंबे अर्से के बाद सीमा प्रहरियों की पहल अब मिसाल के रूप में जानी जाएगी। सीमा की रक्षा ही नहीं, बल्कि बीएसएफ अब किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बनने लगी है। सीमा सुरक्षा बल की 173वीं वाहिनी द्वारा कमांडेंट सुरेंद्र सिंह राठौर कमांडेंट की देखरेख में और जिला प्रशासन कठुआ के सहयोग से तारबंदी के आगे आठ एकड़ में लगाई गई गेहूं की फसल से 34 क्विंटल उत्पादन हुआ है। वहीं, अब किसानों से फसल लगाने के लिए आह्वान किया है।
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सीमा क्षेत्र के गांव बोबिया के ग्रामीणों को प्रोत्साहित करने के लिए तारबंदी के आगे गेहूं की खेती की शुरुआत तारबंदी लगने से लगभग 30 साल बाद हुई है। बीएसएफ के अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 1991 के लगभग क्षेत्र में तारबंदी की गई थी। तभी से किसानों ने तारबंदी के आगे खेती करना छोड़ दिया था। बाद में तारबंदी और सीमा रेखा के बीच के इलाके में जंगल(सरकंडा) आदि हो गया था। गोलाबारी के डर से किसान जहां आगे नहीं जाना चाहते थे, वहीं जंगली घास ने खेती को और भी मुश्किल बना दिया था। सीमा सुरक्षा बल के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन सीमा सुरक्षा बल ने अपने संसाधनों से पहले तारबंदी के आगे की जमीन को खेती योग्य बनाया। फिर जिला प्रशासन कठुआ व गांव वासियों की मदद से लगभग 8 एकड़ जमीन में 3.5 कुंतल गेहूं का बीज डाला गया। फसल पकने के बाद सीमा सुरक्षा बल ने गांववासियों की मदद से उसे काटा।
जैविक तौर पर की गई खेती
बीएसएफ के अधिकारियों ने बताया कि लगभग 34 कुंटल जैविक गेहूं का उत्पादन हुआ है। इस फसल को तैयार करने में सीमा सुरक्षा बल ने किसी तरह की दवाओं का उपयोग नहीं किया है और इसे जैविक तौर पर तैयार किया गया है। 173 वाहिनी सीमा सुरक्षा बल का प्रयास केवल गांव वासियों को मानसिक रूप से प्रोत्साहित करने का है कि तारबंदी के आगे की भी खेती की जा सकती है। अधिकारियों ने बताया कि सीमा सुरक्षा बल के इस प्रयास से ग्रामवासी उत्साहित हैं, जिससे उम्मीद की जाती है कि निकट भविष्य में किसान तारबंदी के आगे खेती करने जाएंगे।
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