-छह करोड़ रुपये से इसी साल शुरू होगा जीर्णोद्धार कार्य
कठुआ। बसोहली का ऐतिहासिक किला जम्मू की प्रसिद्ध मुबारक मंडी से भी पुराना है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार के लिए इसी वित्तीय वर्ष में छह करोड़ रुपये की लागत से कार्य शुरू किया जाएगा। वहीं थीन किले का जीर्णोद्धार कार्य अंतिम चरण में है।
1635 ईस्वी में राजा भूपत पाल द्वारा स्थापित विश्वस्थली नगरी (वर्तमान बसोहली) जम्मू से 130 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश और पंजाब की सीमा से लगा हुआ है। पाल वंश के राजाओं ने आक्रमणकारियों से रक्षा के लिए यहां कई किलों और महलों का निर्माण करवाया था, जिनमें बसोहली और थीन के किले प्रमुख हैं।
400 वर्षों तक डोगरा चंद्रवंशी बिलोरया राजपूतों के अधीन रहे इस क्षेत्र में राजाओं ने समय-समय पर इन संरचनाओं का जीर्णोद्धार करवाया। बसोहली किला कभी एक भव्य महल परिसर हुआ करता था, जिसमें दरबार हॉल, रंग महल और शीश महल जैसे भव्य हॉल थे। 1782 में राजा महिंदर पाल द्वारा निर्मित इन महलों की दीवारों पर भगवान कृष्ण और गोपियों के सुंदर भित्तिचित्र बने हुए थे।
फ्रेंच यात्री विग्ने ने 1835-39 के बीच बसोहली की यात्रा के दौरान इसकी भव्यता की प्रशंसा की थी। हालांकि, समय के साथ आक्रमणों और उपेक्षा के कारण यह किला खंडहर में तब्दील हो गया। संवाद
महल का डिजाइन ऐसा था कि गर्मियों में महल की दीवारें ठंडी हो जाती थीं और इसे प्राप्त करने के लिए वाष्पीकरण की प्रक्रिया पर आधारित एक तकनीक का उपयोग किया गया था। दीवारों के अंदर पाइप का नेटवर्क था, जिनसे पानी बहता था और वाष्पीकरण के कारण कमरे ठंडे हो जाते थे। सर्दियों में इन्हीं पाइप्स से गर्म पानी बहाकर कमरों को गर्म किया जाता था।
- शिव कुमार पाधा, स्थानीय शोधकर्ता
बसोहली में न सिर्फ किला है, बल्कि इसमें महल भी हैं। यह जम्मू की मुबारक मंडी से भी पुराना है। इसकी अपनी एक अनोखी अहमियत रही है। किला और महल नवीन तकनीक के आधार पर बने थे। इनमें बसोहली चित्रकला आज भी कुछ कमरों में दिखाई देती है। वर्तमान में यह खंडहर है, लेकिन इसी साल इसके जीर्णोद्धार के लिए छह करोड़ रुपये से काम शुरू किया जाएगा। यह किले अपने समय में सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहे।
संगीता शर्मा, सहायक निदेशक, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, जम्मू