आरोपी पर था अवैध शराब का कारोबार करने का आरोप
कठुआ। विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट ने आबकारी अधिनियम मामले में आरोपी को सात साल बाद बरी करने का निर्देश दिया है। आदेश के अनुसार चालान को केवल इस आधार पर खारिज किया जाता है कि मामले की जांच अधिकृत व्यक्ति की ओर से नहीं की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी का दोष साबित करने की कोई संभावना नहीं है। लिहाजा मामले में आरोपी को बरी करने के साथ-साथ जमानत और व्यक्तिगत बांड को भी खारिज किया जाता है। मामला वर्ष 2018 का है, जिसमें विजय कुमार निवासी खोख्याल तहसील नगरी परोल पर अवैध शराब (लहान) का कारोबार करने का आरोप था। इसके बाद कठुआ पुलिस ने आबकारी अधिनियम की धारा 48 (ए) के तहत मामला दर्ज कर अदालती कार्यवाही शुरू की गई थी। आरोपी के खिलाफ 10 अगस्त 2018 को आरोप तय किए गए थे।
इसके बाद अभियोजन पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। मामले में अभियोजन पक्ष ने केवल चार गवाह पेश किए। कोर्ट सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि मामले में जांच सहायक उपनिरीक्षक सोम राज की ओर से की गई है, जो आबकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत ऐसा करने में सक्षम नहीं थे। आरोपी के वकील ने कहा कि स्थापित कानून के मुताबिक मामले जांच उपनिरीक्षक अधिकारी स्तर या उसके ऊपर के स्तर के अधिकारी की ओर से की जानी चाहिए थी। लिहाजा मामले को खारिज करने का अपील की गई। इसे कोर्ट ने मान लिया और आरोपी को बरी करने का निर्देश दिया। संवाद