कठुआ। रंजीत सागर झील में इस साल जम्मू-कश्मीर के हिस्से से मछली पकड़ने की एवज में एक करोड़ 46 लाख रुपये की राशि निर्धारित की थी। एक साल में सरकार को डेढ़ करोड़ की चपत लग गई है। इसके बाद अब सरकार बैकफुट पर आई है और दसवीं बार टेंडर प्रक्रिया शुरू करते हुए एक करोड़ रुपये न्यूनतम बोली निर्धारित की है। दरअसल, साल भर ठेकेदारों के लिए निविदा खोले जाने के बाद भी झील से मछली पकड़ने के लिए निविदा प्रक्रिया नौ बार फेल हो गई। पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव के बीच टेंडर में देरी हुई। वहीं मछली पकड़ने के लिए ठेकेदारों ने भी रुचि नहीं दिखाई। इसका बड़ा कारण कम दाम पर पंजाब के हिस्से से मछली का ठेका होना भी है। यही वजह है कि लगातार जम्मू कश्मीर के हिस्से से मछली चोरी बड़े पैमाने पर बढ़ गई है। सरकार ने डेढ़ करोड़ के राजस्व के साथ बड़े पैमाने पर रंजीत सागर मछलियों से भी हाथ धो दिया है।
बाकायदा, पहली बार देश के किसी भी कोने से ठेकेदारों को इस निविदा प्रक्रिया में मछली पालन विभाग ने आमंत्रित किया। बावजूद इसके नौ बार करवाई गई यह प्रक्रिया सिरे नहीं चढ़ पाई है। जम्मू-कश्मीर सरकार के पास रंजीत सागर जलाशय का लगभग 58 फीसदी से अधिक हिस्सा है, जबकि पंजाब के पास 35 फीसदी और शेष हिमाचल के हिस्से आता है।
87 वर्ग किलोमीटर में फैली है रंजीत सागर झील
87 वर्ग किलोमीटर में फैली हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सीमा पर यह झील अनुछेद 370 हटने के बाद प्रदेश सरकार के लिए राजस्व का एक बड़ा जरिया भी बनी है। दरअसल अनुछेद 370 की समाप्ति के बाद लाखों में होने वाली इस झील से मछली निकालने की बोली प्रक्रिया अब करोड़ों में पहुंच गई है। साल 2021 में मछली निकालने के ठेके से 52 लाख, जबकि वर्ष 2022 में एक करोड़ 22 लाख रुपये की राशि सरकार के खजाने में आई थी। बीते साल यह प्रक्रिया एक करोड़ 33 लाख में पूरी हुई थी।