जिला के पहाड़ी इलाकों में बिजली समस्या से लोगों को दो चार होना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में इन पहाड़ी क्षेत्रों में समस्या बढ़ने वाली है लेकिन विभाग ने हर साल की तरह इस बार भी इस समस्या से निपटने के लिए खास योजना तैयार नहीं की है।
जिला के कई पहाड़ी क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर बिजली सेवा पहुंच ही नहीं पाई है और कई स्थानों पर साल में सर्दी के महीनों में बर्फ गलने तक बिजली सेवा बंद रहती है।
गौरतलब है कि इन स्थानों पर अभी भी लकड़ी के खंभे और पुराने तारों से ही विभाग काम चला रहा है। ऐेसे में जहां बार बार तारों के टूटने से बिजली सेवा बंद हो जाती है तो बर्फबारी के दौरान लकड़ी के ख्ंाभे गिर जाते हैं और जब तक बर्फ पिघलती नहीं है तब तक इन क्षेत्रों में बिजली बंद ही रहती है और लोगों को ब्लैक आउट में ही रहना पड़ता हैै।
आंकड़ों के अनुसार जिला के इन पहाड़ी क्षेत्रों में हर साल तीन से साढ़े तीन महीने अंधेरा ही पसरा रहता है और लोगों को दियों के सहारे ही रात गुजारनी पड़ी है। विभाग इन क्षेत्रों में अपनी मजबूर बताता है कि बर्फ पिघलने तक वह रिपेयर का कार्य शुरू नहीं कर सकते हैं।
जिला के पहाड़ी क्षेत्रों की बात करें तो वहां पर विभाग ने दो दर्जन से अधिक खंभों का प्रपोजल नहीं भेजा है। इसके पीछे का तर्क यह है कि खंभो को पहुंचाने के लिए मानवीय लेबर इस्तेमाल में आती है मशीन के द्वारा इन क्षेत्रों में खंभों को नहीं पहुंचाया जा सकता है। इसके साथ ही विभाग के पास इतनी मात्रा में लेबर नहीं है कि वह एक साल में सैकड़ों के हिसाब खंभो का वहां तक पहुंचा पाएं।
संदरून, भंडार, कोटी चिंडयार, बांजल, डग्गर, सरथल, रोलका, दोलका, जोड़े माता में जब तक बर्फ रहती है वहां पर ब्लैक आउट यानी बिजली सेवा बंद रहती है। चूंकि बर्फ के कारण वहां पर मरम्मत का कार्य भी नहीं हो पाता।
ऐसे में विभाग के पास सिवाए बर्फ पिघलने का इंतजार करने के दूसरा कोई चारा नहीं बचता है। नतीजन तीन महीने तक इन क्षेत्रों में हर साल अंधेरा ही छाया रहता है।