देश की राजधानी दिल्ली को जहां दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक माना जाता है। राजधानी दिल्ली जैसा प्रदूषण न होने के बाद भी जलवायु के हिसाब से कहीं बेहतर जम्मू कश्मीर में कठुआ जिला प्रदूषण के मानदंडों की धज्जियां उड़ाता नजर आ रहा है। दिल्ली शहर में जहां हवा में आरएसपीएम की मात्रा 250 के लगभग है, वहीं कठुआ भी ज्यादा पीछे नहीं है।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कठुआ औद्योगिक क्षेत्र में लगे मानीटरिंग डिवाइस ने 120 से 150 माइक्रोग्राम तक आरएसपीएम की मात्रा के आंकड़े मिले हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह आंकड़ा लगातार बढ़ा है। प्रदूषण मानकों के अनुसार हवा में आरएसपीएम या पीएम 10 की मात्रा 100 माइक्रोग्राम से कम ही रहनी चाहिए।
गौरतलब है कि इस औद्योगिक क्षेत्र में दर्जनों सीमेंट इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सभी संयत्र लगे हैं, लेकिन इसकी असलियत कोई भी इलाके से गुजरते समय महसूस कर सकता है। हवा में उड़ रहे कण गले और श्वास और हृदय के रोगों को भी बढ़ावा दे रहे हैं। हालत ऐसी हो गई है कि शहर हटलीमोड़ इलाके के लोगों ने घर की छत पर कपड़े सुखाने तक बंद कर दिए हैं। घर की खिड़कियां अधिकतर समय बंद ही रहती हैं।
यहां तक कि हवा प्रदूषित होन से लोगों ने शाम के समय सैर के लिए निकलना ही छोड़ दिया है। सामाजिक संस्था जन सेवा संस्थान ने दावा किया है कि प्रदूषण मानकों की अवहेलना किए जाने से आम लोगों को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है। एक ओर जहां 50 के लगभग बच्चे अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हैं, वहीं कठुआ औद्योगिक क्षेत्र से सटे गोविंदसर और आसपास के इलाके में ही 14 से अधिक हृदय रोगी भी हैं।
संस्था के शशि शर्मा ने साफ कहा कि औद्योगिक इकाइयों ने बीते दशक में इलाके की जैव विविधता को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। सीमेंट इकाइयों के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बीते सालों में रिहायशी इलाके से सटकर कीटनाशक यूनिटों को भी अनुमति दे दी है। उन्होंने बताया कि प्रदूूषण नियंत्रण विभाग ने कभी भी इलाके में प्रदूषण के आंकड़ों को सार्वजनिक नही किया है। हाईवे से सटे इलाके में टायर ग्राइंडिंग यूनिट लगवाकर लोगों की नाक में दम कर दिया है।