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Kathua News: कैलाश कुंड यात्रा...दर्शन करने के लिए उत्सुक श्रद्धालु

Tue, 19 Aug 2025 01:04 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
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कैलाश कुंड संवाद
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कठुआ। डोडा और कठुआ जिले की सीमा पर पहाड़ी चोटियों में आस्था के सरोवर में डुबकी लगाने के लिए हजारों श्रद्धालु हर साल दुर्गम पहाड़ों पर मीलों का पैदल सफर तय कर भक्त सर्पराज भगवान वासुकीनाग के दर्शन को पहुंचने के लिए उत्सुक हैं। हर बार यात्रा में चंबा, कठुआ, उधमपुर, डोडा, जम्मू के साथ साथ पड़ोसी राज्यों के हजारों भक्त कैलाश कुंड यात्रा में भाग लेते हैं। श्रावण पूर्णिमा के 14 वें दिन शुरू होने वाली यह यात्रा में विभिन्न यात्रा रूट से आने वाले भक्त पड़ाव में भजन-कीर्तन, जयघोष के साथ ढक्कू की सुंदर धुन पर नृत्य करते हुए पहुंचते हैं।
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कैलाश कुंड (कपलाश) को वासुकी कुंड भी कहा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यह कुंड नागराज वासुकी का वास है। समुद्र तल से 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शीतल और स्वच्छ जल के बड़े कुंड में पवित्र स्नान के लिए लोग दुर्गम पहाड़ों और विहंगम नजारों के बीच पहुंचते हैं। मुख्य यात्रा भद्रवाह के गाठा से शुरू होती है, जहां भगवान वासुकी नाग का प्राचीन मंदिर है और लोग इसे कुलदेव के रूप में पूजते हैं।
राजा भूपत पाल ने नाम दिया वासक छल्ला



इतिहासकारों की मानें तो 1629 में, बसोहली के राजा भूपत पाल ने भद्रवाह पर कब्जा कर लिया। बसोहली और भद्रवाह के बीच से छत्रगलां से होकर बनी के पनियालग से होकर रास्ता गुजरता था। वासुकी नाग मंदिर पनियालग को लेकर एक लोक कथा के अनुसार भद्रवाह की ओर जाते समय राजा भूपत पाल ने कैलाश कुंड का रास्ता अपनाया। यहां नागराज वासुकी नाग की मौजूदगी से अनभिज्ञ राजा ने हवा से भरी एक बक की चपड़ी से बने बैग के सहारे कुंड को पार करने की कोशिश की। जैसे ही राजा कुंड के बीचों बीच पहुंचे उन्हें एक विशाल नाग कुंड के भीतर दिखाई दिया और राजा से पूरी तरह से लिपट गया। राजा ने नागराज के सामने अपनी गलती को मानते हुए नतमस्तक हुआ और यह कहा कि वो कुंड को पार नहीं करेगा और वापिस लौट जाएगा। वचन देने के साथ ही राजा ने नागराज को अपने कान के छल्ले चढ़ाए और यह भी कहा कि वो बसोहली में मंदिर का निर्माण भी करवाएगा जहां लोग भगवान विष्णु के अवतार वासुकी नाग की पूजा कर सकेंगे। वापसी पर चिंतति राजा यह सोच रहा था कि आखिर मंदिर का निर्माण कैसे किया जाए और मूर्तियां कहां से आएंगी। इसी बीच उन्हें जानकारी मिली कि अशपति पर्वत के नजदीक भद्रवाह के पीछे वासुकी नाग का एक मंदिर है जहां उत्कृष्ट नक्काशी से जिम्मुत वाहन और वासुकी नाग को दर्शाया गया है। राजा ने तुरंत आदेश दिया कि शिल्पकारों से बसोहली के लिए वैसी ही मूर्तियां बनवाई जाएं। राजा छत्रगलां की ओर से वापिस लौट रहा था इस बीच उसे प्यास लगी। उसने एक झरने से पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया और महसूस किया कि उसके हाथ में आकर कुछ रूक गया है। झरने से उसने वहीं कान के छल्ले पाए जो राजा ने कैलाश कुंड में चढ़ाए थे। राजा को अपना वचन याद आ गया और उसने कैलाश कुंड को वासक छल्ला का नाम भी दिया। स्थानीय लोग आज भी इसे वासक छल्ला के नाम से जानते हैं।
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