11 महीने बाद भी टेंट में कट रही जिंदगी, अब बच्चों की भी नहीं कर पा रहे शादी
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। 16 अगस्त 2025...यह तारीख बागड़ा के चार परिवारों के लिए कभी न भूलने वाली वह काली रात है, जिसने पल भर में इनकी सारी खुशियां मलबे के ढेर में दफन कर दी। किसी ने परिवार के सदस्यों को खोया तो किसी की जिंदगी भर की कमाई हुई पूंजी आज भी मलबे में दफन है। हादसे के 11 महीने बीत चुके हैं, लेकिन त्रासदी के जख्म आज भी वैसे ही हरे हैं। जिन घरों के आंगन में कभी बच्चों के खेलने की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ मलबा पटा हुआ है। कोई दुखी होकर गांव ही छोड़ गया तो कोई टेंट और पशुशाला में दिन बीता कर सरकारी सहायता और स्थायी पुनर्वास का आस लगा बैठा है।
त्रासदी में उजड़े तीन परिवार पुराने टीन के घरों में रहने के लिए मजबूर है। सरकारी मदद के नाम पर प्रभावितों को राज्य आपदा कोष से कुछ मदद मिली हुई है, लेकिन सरकारी घोषणा प्री-फेब्रिकेटेड मकानों का आज भी इंतजार है। सुरेखा देवी कहती हैं कि घर न होने से जवान बच्चों की शादी नहीं हो रही है, जबकि उनकी उमर निकलती जा रही है। मेरे दो देवर की शादी इसलिए नहीं हो पा रही है कि न तो पास में कोई गहना बचा है और न पैसे।
जो भी था, वह घर के भीतर दफन है। पिछले 11 महीने से पूरा परिवार सिर्फ जमींदोज घर की छत तोड़कर सरिया ही निकाल पाए हैं। बिना मशीन के खोदाई हो नहीं सकती और मशीन लगाने के लिए न तो पूंजी बची है और न नया घर बनाने की उम्मीद है। त्रासदी में पत्नी और बेटी गंवाने वाले प्रवीन सिंह दोबारा बुजुर्ग माता-पिता के पास रहना शुरू कर दिया है।
बागड़ा के कई अन्य प्रभावित परिवारों की कहानी भी इससे अलग नहीं है। किसी ने अपना घर खोया, किसी ने खेत तो किसी ने अपने परिवार के सदस्य। लगभग एक वर्ष बाद भी कई परिवार स्थायी आवास का इंतजार कर रहे हैं। एक परिवार गांव छोड़कर शहर के पास रहने चला गया। बादल फटने की त्रासदी सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं, बल्कि उन अधूरे सपनों, बिखरे परिवारों और अंतहीन इंतजार की दास्तां है, जो आज भी सरकारी पुनर्वास और एक सुरक्षित छत की आस लगाए हैं।
जमीन बेचकर बनाया था आशियाना, न बची जमीन और न घर
पीड़ितों में सुखदेव सिंह का परिवार भी है, जिनकी आंखों में आज भी उस मनहूस दिन की तस्वीरें तैर आती हैं। उन्होंने जीवनभर की जमा-पूंजी और जमीन बेचकर लगभग 2500 वर्ग फीट पक्की छत से ढंके अपने सपनों का घर बनाया था। इसमें कुल दो परिवार रहते थे। घर के एक हिस्से में जल शक्ति विभाग में अस्थायी कर्मचारी सुखदेव सिंह का परिवार रहता था और दूसरे हिस्से में उसकी मां और दो छोटे भाई रहते थे। बादल फटने के बाद आए भीषण सैलाब और मलबे ने उनका पूरा घर देखते ही देखते जमींदोज कर दिया।
घर के साथ वर्षों की मेहनत से बनाए गए गहने, जरूरी दस्तावेज, घरेलू सामान और जीवनभर की कमाई आज भी मलबे में दबी हुई है। आज तक न तो वह सामान मिला और न ही उन यादों को संजोने वाली कोई निशानी। सुखदेव की पत्नी सुरेखा देवी बताती हैं कि त्रासदी में उसके पति और बेटा अभि, उसकी सास और दोनों देवर भी चोटिल हुए थे लेकिन भगवान का शुक्र है कि किसी की जान को कोई नुकसान नहीं हुआ।
मलबे में दबी पत्नी बचाने की गुहार लगाते-लगाते तोड़ दी दम
आज भी उस मनहूस रात को यादकर प्रवीण सिंह टूट जाते हैं। बकौल प्रवीण सिंह, त्रासदी की आधी रात भारी बारिश और कड़कती बिजली ने उनकी नींद तो खोल दी थी, लेकिन बादल फटने के बाद जो हुआ वो उनकी कल्पना से भी परे था। अचानक पहाड़ी से आए मलबे से जमींदोज हुए नवनिर्मित मकान से अपनी पत्नी रेनू और बेटी राधिका को नहीं बचा सका। कुछ ही मिनटों में पूरा घर बिखर गया।
प्रवीण सिर्फ बेटे शिव को ही मलबे से बाहर निकाल सका, जबकि पत्नी रेनू कहती रही। शिव के पापा मुझे और राधिका को भी बाहर निकालो। प्रवीण सिंह कहते हैं कि मुहल्ले के अंतिम छोर पर सिर्फ उसी का ही अकेला मकान था। दो घंटे बाद जब तक गांव के लोग उसके घर तक पहुंचे, उसकी पत्नी और बेटी दम तोड़ चुकी थी। बेटे शिव का शरीर मलबे में दबने से पूरा नीला पड़ गया था और उसका अपना शरीर चोटिल हो चुका था।
बागड़ा की आपदा से प्रभावित परिवार को प्रशासन से मिला टेंट, एक टीन का कमरा और यह टेंट ही अब आसर
बागड़ा की आपदा से प्रभावित परिवार को प्रशासन से मिला टेंट, एक टीन का कमरा और यह टेंट ही अब आसर