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Kathua News: एनडीपीएस मामले में आरोपी सात साल बाद बरी

Sun, 11 Jan 2026 12:42 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
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साल 2018 का शहर से सटे चक द्राब खान का मामला
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कठुआ। विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट ने एनडीपीएस के सात साल पुराने मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। आदेश के अनुसार मामले में गवाहों के विरोधाभासी बयान और अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से मामले में जांच अधिकारी एफएसएल विशेषज्ञ को कोर्ट में पेश नहीं किया गया जिससे आरोपी की चेन ऑफ कस्टडी साबित नहीं हो सकी। इसके कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी करने का फैसला सुनाया। कोर्ट में दायर चालान के अनुसार मामला 8 जुलाई 2018 का पुलिस चौकी नगरी के तहत इलाके चक द्राब खान का है। घटना के दिन तत्कालीन चौकी प्रभारी अपनी टीम के साथ गश्त पर थे।
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टीम चक द्राब खान इलाके में पहुंची तो संदिग्ध व्यक्ति पुलिस को देख भागने की कोशिश की और पुलिस टीम ने उसे मौके पर पकड़ लिया। तलाशी लेने पर पुलिस ने उसकी पैंट की जेब से एक सफेद पॉलिथीन बरामद किया जिसमें 1.20 ग्राम हेरोइन होने का दावा किया गया। इसके बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज कर चालान को कोर्ट में 14 नवंबर 2018 को प्रस्तुत किया। आरोपी के खिलाफ आरोप 7 मार्च 2019 को तय किए गए। इसमें आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमा चलाने की वकालत की। इसके बाद अदालत ने अभियोजन पक्ष को मामले में गवाह पेश करने का निर्देश दिया। अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 9 गवाहों में से छह के बयान किए गए। अदालत में गवाहों के बयान से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि तलाशी किस अधिकारी की ओर से की गई थी। कोर्ट ने माना कि तलाशी के दौरान एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के अनुपालन को लेकर गवाहों की गवाही में विरोधाभास है।
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चौकी प्रभारी ने कहा कि आरोपी से मौखिक रूप से पूछा गया था कि क्या वह मजिस्ट्रेट या गजटेड अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी चाहता है जबकि अन्य गवाहों ने कहा कि ऐसा कोई सवाल आरोपी से नहीं किया गया। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि घटना स्थल भी भीड़-भाड़ वाला क्षेत्र था लेकिन कोई स्वतंत्र नागरिक गवाह शामिल नहीं किया गया। इसके बाद अदालत ने गवाहों के विरोधाभासी बयान और अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना पर अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर बताते हुए आरोपी को संदेह लाभ देकर बरी कर दिया।
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