साल में दो बार दरबार मूव करते हैं खानाबदोश समुदाय
कठुआ से दच्छन, मड़वा, किश्तवाड़, पाडर समेत दूरदराज पहाड़ों तक तय करते हैं एक महीने का कठिन सफर
परिवार और माल मवेशियों को साथ लेकर चलते हैं
संवाद न्यूज एजेंसी
सरथल (कठुआ)। माैसम खुलते ही गुज्जर बकरवाल समुदाय का पहाड़ों की तरफ पलायन शुरू हो गया है। इससे जिले का ऊंचाई वाला इलाका आबाद हो गया है। कठुआ के मैदानों से दच्छन, किश्तवाड़, पाडर, मचैल, भद्रवाह, जांस्कार तक अपने मौसमी सफर के लिए 450 बकरवाल परिवार गर्मियां बिताने के लिए निकल चुके हैं। साढ़े दस हजार फुट की ऊंचाई पर बर्फ से ढंकी चोटियों को पार कर यह जिले से भद्रवाह और डोडा में दाखिल होना शुरू हो गए हैं। इनकी यात्रा हर साल अप्रैल के महीने में कठुआ और पंजाब से शुरू होकर चिनाब घाटी में एक महीने तक के सफर के बाद पूरी होती है।
हर साल प्रदेश सचिवालय के साथ-साथ राज्य की 20 प्रतिशत आबादी सचिवालय की ही तरह अपने आवास बदलती है। बाकायदा काफिला चलता है। इन्हें दस्तावेजी कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ती है। यह दरबार मूव है गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों का जो हर साल मौसम के बदलाव के साथ अपने मवेशियों को लेकर पहाड़ों और मैदानी इलाकों का रुख करते हैं।
आमतौर पर बकरवाल गर्मी के मौसम में पहाड़ों पर जाने का सिलसिला मार्च के अंत और अप्रैल के पहले सप्ताह में शुरू हो जाता है। इस बार बारिश और बर्फबारी के चलते यह लगभग एक पखवाड़ा देरी से जा रहे हैं। कठुआ के लखनपुर से लेकर बनी के बीच बड़ी संख्या में सड़क किनारे शाम को डेरा डाले हुए हैं। दिन के समय अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हुए इन्हें देखा जा सकता है। अगले कुछ दिनों तक सरथल इनका सबसे अहम पड़ाव रहेगा।
आंकड़ों के मुताबिक गर्मी के महीने में हर साल बकरवाल और गुज्जर के सैकड़ों खानाबदोश परिवार, जानवरों के झुंड के साथ चिनाब घाटी के ऊंचाई वाले मैदानी क्षेत्रों में आते हैं। सर्दियों के मौसम से पहले अक्टूबर में यह सभी खानाबदोश जम्मू समेत कम ठंड वाले जिलों में लौटना शुरू कर देते हैं। कठुआ के खुड़वा पहुंचे 60 वर्षीय रकीब ने बताया कि कठुआ जिले के अठून गांव से आए हैं। वह बर्फ के बीच से गुजरकर पशुओं के साथ किश्तवाड़ के दूरदराज इलाकों तक का सफर तय करेंगे। जंगली जानवरों से लेकर मौसम की दुश्वारियां रहती हैं लेकिन इसी से उनकी रोजी रोटी चलती है। सरकार की ओर से वाहन उपलब्ध करवाने के दावे तो किए जाते हैं लेकिन हासिल कुछ नहीं होता।
घगरोड़ बटाडा बसोहली से पाडर तक जा रहीं बूबां बेगम ने बताया कि उनकी उम्र 70 वर्ष है। हर साल परिवार और मवेशियों के साथ वह गर्मी के दिनों में पाडर का सफर करती हैं और अक्टूबर महीने में लौट आती हैं। अब पहले से रहन-सहन बदल गया है। स्थायी मकान है और शिक्षा अर्जित करने के लिए बच्चे वहीं ठहरते हैं।