श्रीमद् भागवत कथा के दौरान प्रवचण करते गौतम जी महाराज संवाद
शहर के वार्ड नंबर 19 स्थित आदियोगी धाम आश्रम में श्रीमद् भागवत कथा जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। शहर के वार्ड नंबर 19 स्थित आदियोगी धाम आश्रम में श्रीमद् भागवत कथा जारी है। शुक्रवार को कथाव्यास आदियोगी गौतम महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं के समक्ष अपने भागवत ज्ञान के माध्यम से धर्म का अर्थ समझाया। वहीं उनके द्वारा प्रस्तुत भजनों पर उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालु झूमते रहे।दूसरे दिन की कथा में आदियोगी ने उपस्थित श्रद्धालुओं की ईश्वर के श्री चरणों से निष्काम प्रेम करने का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि नारद जी को भगवान के चरणों से निस्वार्थ प्रेम था और भगवान का सांनिध्य प्राप्त किया। यही उपदेश महार्षि वेदव्यास जी को नारद जी ने तब दिया जब 17 पुराणों का अध्ययन करने के बाद भी व्यास जी को संतोष नहीं हुआ तो नारद ने भागवत का विस्तार करने की प्रेरणा दी। सुकदेव जी ने वेदव्यास जी से भागवत का अध्ययन किया।
उन्होंने कथा के सात दिनों के आशय को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब राजा परीक्षित को श्रृंग ऋषि ने 7 दिन के बाद तक्षक नाग के डसने से अकाल मृत्यु होने का श्राप दिया तो राजा परीक्षित अपनी मुक्ति का उपाय ढूंढने लगे। इस दौरान उन्होंने हजारों संतों से केवल एक ही प्रश्न किया कि जल्दी मरने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए। उनके इस प्रश्न पर सभी ऋषि उत्तर नहीं दे पाए। तब शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भगवत का उपदेश दिया और केवल 7 दिनों में ही राजा को जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दिया। कथाव्यास ने कहा कि मानव का जन्म 7 दिनों में होता है और मृत्यु भी 7 दिन के अंतर्गत होती है। हमारे जीवन में 7 दिनों का बहुत महत्व है। उन्होंने कहा कि सात का अर्थ सत्य है और सत्य केवल परमात्मा है। यह संसार मिथ्या है इस संसार में रहने वाला मनुष्य जीवन में परमात्मा से नश्वर वस्तु को मांगता है और फिर दुख भोगता है। श्री भगवत कथा सप्त सिद्धी परमात्मा से परमात्मा को ही मांगने का अर्थात भक्ति का उपदेश देती है क्योंकि इसी से सभी जीवों का कल्याण संभव है।