डोरी वर्क के साथ तैयार सजावटी समान दिखाती मुश्ताक बेगम। स्रोत स्वयं
कठुआ। गोविंदसर की मुश्ताक बेगम ने डोरी वर्क को रोजगार का साधन बना लिया है। शहर से सटे गांव गोविंदसर निवासी महिला मुश्ताक बेगम ने आधुनिकीकरण की दौड़ में लुप्त होती पारंपरिक कला डोरी वर्क को जीवित रखा है। मुश्ताक के हाथों से तैयार किए शॉल और अन्य परिधान ग्राहकों को खूब पसंद आ रहे हैं।
मुश्ताक बेगम बताती हैं कि उन्होंने यह कला किसी संस्थान से नहीं सीखी बल्कि उन्हें यह विरासत में परिवार से मिली है। अलबत्ता यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म से मिली जानकारी ने उन्हें और पारंगत होने में मदद दी है। उन्होंने बताया कि डोरी वर्क एक पारंपरिक कढ़ाई कला है जिसमें धातु की डोरियों से कपड़ों पर सजावटी डिजाइन बनाए जाते हैं।
इससे शादी के परिधान, दुपट्टे, साड़ियां, शेरवानी, लहंगे और गृह सज्जा की सामग्री तैयार की जाती है। यह कला मुगलकालीन शाही परिधानों से जुड़ी हुई है और आज भी कपड़ों से लेकर गृह सज्जा तक हर जगह इस्तेमाल की जाती है। मुश्ताक बेगम ने इस हुनर को बेटी और आसपास की कई लड़कियों को भी सिखाया है। यद्यपि उन्होंने इसे रोजगार के रूप में नहीं अपनाया लेकिन जब काम अधिक होता है तो वे सहयोग करती हैं। इस तरह यह कला धीरे-धीरे समाज में भी फैल रही है। उनके इस काम को बढ़ावा देने में वुमेन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का विशेष योगदान रहा। कॉर्पोरेशन ने उन्हें कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराया जिससे वे अपना काम आसानी से चला पा रही हैं।
इस सहयोग के चलते वे जगह-जगह लगने वाले मेलों और प्रदर्शनियों में उत्पाद प्रदर्शित करती हैं। इससे उन्हें अपने तैयार सामान को बेचने में कोई कठिनाई नहीं आती और उनकी पहचान भी बढ़ रही है। मुश्ताक बेगम बताती हैं कि इस कला के जरिए वे अपने घर पर रहकर ही हर महीने लगभग 12 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। यह न केवल उनके परिवार की आर्थिक मदद करता है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाता है।