कठुआ। शहर के ब्राह्मण सभागार में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। भगवान परशुराम जयंती समारोह के चलते होने वाले इस आयोजन के दूसरे दिन रविवार को कथावाचक संत सुभाष शास्त्री ने प्रेम का आशय बताया। उन्होंने भगवान के प्रति निष्काम प्रेम करने के लिए कहा। जैसा नारद जी को श्री हरि से था। परिणामस्वरूप उन्हें भगवान का सानिध्य मिला।
शास्त्री जी ने संगत को समझाया कि प्रेम शब्द को हर कोई अपने-अपने तरीके से परिभाषित करता और समझता है लेकिन हमें यह जान लेना चाहिए कि प्रेम यदि आसक्ति पूर्ण है तो वह प्रेम न होकर मोह है। प्रेम देना चाहता है, अगर लेना चाहे तो वह प्रेम नहीं। उन्होंने कहा कि काम बंधन है और प्रेम प्रसन्नता देने वाला है। काम-वासना जहां तुम्हें बांधती है, वहीं, प्रेम प्रदान करता है। प्रेम एक पवित्र शुद्ध चीज है, जबकि कामवासना एक कांटा है।
संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि संसारी मनुष्य आपस में प्रेमपूर्वक रहे तो संसार कितना सुंदर हो जाए लेकिन हमारा अहंकार हमें प्रेम करने नहीं देता। यदि हम अहंकारी हैं तो हम प्रेम करने का दिखावा ही कर सकते हैं। वास्तव में प्रेम नहीं कर सकते। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन प्रेम किया, तिन ही प्रभु पायो, इसलिए अहंकार का त्याग कर हर जीव से हर प्राणी से सदैव प्रेम करें। इससे आपको आत्म सुख की अनुभूति होगी।