बसोहली। जंजघर बसोहली में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में संत सुभाष शास्त्री ने संगत को समझाया कि आत्मज्ञानी न केवल संगत को ज्ञान का प्रसाद बांटते हैं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।
आप अपने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी धर्म अनुसार जीवनयापन कैसे कर सकते हैं। जीवन में तीन चीज मिलना कठिन है। पहले अच्छी पत्नी, दूसरा अच्छा पुत्र और तीसरी अच्छा पड़ोसी। पत्नी और धर्म पत्नी में फर्क है, जो पतन के मार्ग पर ले जाए वह पत्नी है और जो खुद धर्मपथ पर ले जाए और पति को चलने के लिए भी प्रेरित करे, वह धर्मपत्नी है। अच्छा पुत्र वही है, जो मां-बाप को अपने पास रखता है और जीवन भर उनकी सेवा करता है। अच्छे पड़ोसी से अच्छा कोई मित्र नहीं। हम मित्रों के बिना तो जी सकते हैं लेकिन अच्छे पड़ोसी के बिना नहीं। संतों का पड़ोसी ईश्वर होता है।
संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि अस्थायी खुशी चाहिए तो टाटा बिरला अंबानी की तरह संपत्ति कमा लीजिए और अगर आपको जीवन भर खुशी चाहिए तो हर हालत में मस्त रहिए और भगवान का नाम जपते रहिए। धर्म और अध्यात्म का दमन थाम कर जो हर हाल में मस्त रहता है, वह कभी तनावग्रस्त नहीं हो सकता। जीवन का सार चरित्र है। जिसने चरित्र बटोर लिया, उसने वेद विज्ञान को पा लिया। फूल की आयु बहुत अल्प होती है, लेकिन वह हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर देता है। हम भी भले ही थोड़े साल जिएं लेकिन फूल की तरह जिएं। हमारा चेहरा और चरित्र कुछ इस तरह का हो कि जो भी हमें देखे, उसका चेहरा मुस्कुराहट से भर जाए। ऐसा केवल धर्म अनुसार जीवन जीने से ही संभव हो सकता है।