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जिले की ग्यारह प्रतिशत आबादी पिछड़ेपन से जूझने को मजबूर

Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
Kathua
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कठुआ। जिले को दूध की सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा उपलब्ध करवाने वाला समाज गुमनामी का जीवन यापन करने को मजबूर है। हर साल मवेशियों के साथ जिले के सैकड़ों गुज्जर बकरवाल परिवार मौसम के बदलने पर पलायन करते हैं। स्थाई निवास नहीं होने के कारण ये सरकार के प्रयासों का भी लाभ नहीं उठा पाते।
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वर्तमान में खानाबदोशों का जीवन व्यतीत कर रहे गुज्जरों का इतिहास बताता है कि कभी उत्तर भारत पर यह समुदाय राज किया करता था, लेकिन मौजूदा समय में आधुनिकता और शिक्षा से पिछड़ चके समाज के इस तबके को सरकार के प्रयासों के बाद भी मुख्य धारा में लाना आसान नहीं है। इतिहास में गुज्जरों के दबदबे को पांचवी सदी में संपूर्ण उत्तर भारत में महसूस किया गया। हालांकि समृद्ध जीवनशैली के बावजूद उनके जीवन में कुछ सुधार तो आया, लेकिन समाज की बदलती परिभाषाओं में यह सुधार नाकाफी ही रहा है। वर्तमान में भी यह समाज पिछड़ा हुआ माना जाता है।
क्या है जीवनशैली
राज्य में गुज्जरों को उप-जनजाति के रूप में प्राथमिकता दी गई है। गुज्जर संस्कृति एक समृद्ध संस्कृतियों में से एक मानी जाती रही है। राज्य की अन्य विविधताओं की तरह गुज्जर भी इंडो आर्यन भाषा डोगरी का प्रयोग किया जाता रहा है। गुज्ज्जरों की जीवनशैली, आर्ट, क्राफ्ट, पोशाक परंपराएं और भोजन की आदतें क्षेत्र के साथ बदलती नजर आती हैं। बकरवाल गुज्जर अधिकतर सलवार कमीज, अंगू और पगड़ी पहनावे के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं, जबकि महिलाएं जूबो, फिरनी, शाल या टोपी का जोड़ा प्रयोग करती हैं। दोधी गुज्जर पगड़ी, कमीज और तहमत को पहनावे के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। वहीं महिलाएं धारियों वाली कमीज और चूड़ीदार सलवार प्रयोग करती हैं। अमूमन गुज्जर विशेष घास से तैयार किए गए कुल्लों में रहते हैं जबकि बकरवाल दोआरियों और तंबुओं में ही रात गुजारते हैं।
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गुज्जरों की स्थिति
राज्य के अन्य जिलों की ही तरह कठुआ जिले में भी गुज्जरों की प्रतिशत वर्ष 2001 की जनगणना में ग्रामीण क्षेत्रों में 7.1 प्रतिशत और शहरी इलाके में 1.1 प्रतिशत दर्शाई गई है। हिमाचल और पंजाब से सटे जिले में गुज्जरों की उपस्थिति तो है जो जिले को दूध और इससे जुड़े उत्पादों की बड़ी खेप हर रोज पहुंचाते हैं। लेकिन साक्षरता के लिहाज से यह वर्ग काफी पिछड़ा हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मात्र सात प्रतिशत गुज्जर आबादी ही अबतक शिक्षित हो सकी है जबकि महिलाओं में इनकी संख्या न के बराबर है। दूध और मवेशियों के व्यवसाय के साथ जुड़े समाज का पिछड़ापन इनकी व्यस्त जीवनशैली में पिछड़ेपन का भी आधार है।
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