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स्कूल के शौचालय से सटे गटर में बच्चे करते हैं शौच

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आशीष कपूर
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बसोहली। बसोहली सब डिवीजन के शीतलनगर इलाके में स्थित हायर सेकेंडरी स्कूल पानी की भारी कमी से जूझ रहा है। हालत यह है कि पीएचई सप्लाई का पानी स्कूल में सुबह आधे घंटे तक तो आ जाता है, लेकिन इमारत की छत पर रखे वॉटर टैंक में नहीं भर पाता। ऐसे में स्कूल में शौचालय होने का बच्चों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है।
स्थानीय लोगों ने बताया कि शीतल नगर हायर सेकेंडरी स्कूल के शौचालय में पानी की व्यवस्था न होने से बच्चे खुले में शौच के लिए जाते हैं। शौचालय की इमारत से सटे गटर को अब शौचालय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है चूंकि स्कूल के शौचालय में पानी ही नहीं है। लगभग 800 बच्चों वाले इस स्कूल में शौचालय का न होना सबसे बड़ी दिक्कत है। स्कूल से सटी खाई के किनारे शौच के लिए जाने पर हादसों की आशंका भी लगातार बनी रहती है। लोगों ने बताया कि छात्राओं के लिए दिक्कत सबसे अधिक है। एक ओर जहां केंद्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत महिलाओं और युवतियों को शौचालय उपलब्ध करवाने के दावे करती है तो वहीं दूसरी ओर इस स्कूल में छात्राओं को बिना पानी वाले शौचालयों को इस्तेमाल करने को मजबूर होना पड़ रहा है। शौचालयों में गंदगी इस कदर व्याप्त है कि अब तो बच्चों के बीमार होने का खतरा मंडराने लगा है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द उचित इंतजाम किए जाएं, ताकि बच्चों को इस नारकीय स्थिति से बाहर निकाला जा सके।
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वर्ष 2011 में बने कमरे भी ढह गए, सेना की मदद का भी नहीं मिला लाभ
लोगों ने बताया कि शीतलनगर हायर सेकेंडरी स्कूल में वर्ष 2011 में सेना की ओर से आपरेशन सद्भावना के तहत असेंबली हॉल का निर्माण करवाया गया था लेकिन निर्माण के कुछ साल के भीतर ही यह इमारत धराशाई हो गई। सात साल बाद अब स्कूल प्रांगण में इस इमारत के खंडहर ही बचे हैं। न ही इस इमारत की घटिया गुणवत्ता से हुए निर्माण की कभी जांच करवाई गई और न ही कभी किसी ने इसकी मरम्मत को लेकर कभी कोई सोच आगे बढ़ाई।
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डेढ़ साल बाद भी बस स्टैंड से स्कूल तक नहीं पूरा हो सका सड़क का काम
स्थानीय लोगों ने बताया कि शीतलनगर हायर सेकेंडरी स्कूल को जोड़ने वाली सड़क का निर्माण लगभग डेढ़ साल पहले शुरू करवाया गया था। इससे बच्चों को सहूलियत होते चूंकि बारिश के दिनों में यह सड़क कीचड़ और गड्डों से भर जाती रही। लेकिन हैरत की बात है कछुआ चाल से चल रहा यह काम पिछले डेढ़ साल में मात्र बीस फीसदी तक ही पूरा हो पाया है। ऐसे में बच्चों को अभी भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
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