कठुआ। खराब मौसम ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। मौसम की सबसे अधिक मार इस बार किसानों को पड़ने वाली है। जनवरी माह की शुरुआत से फरवरी माह की शुरूआत तक लगातार पारे में उतार चढ़ाव की वजह से जिला के कई इलाकों में येलोरस्ट ने दस्तक दे दी है। पिछले एक पखवाड़े में लगातार पारे के लुढ़कने और कई कई दिन धूप न खिले की वजह से येलोरस्ट के लक्षण फसलों में दिखने लगे हैं।
जिले में 58 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर गेहूं की खेती की जाती है। ऐसे में खतरा पूरे जिले पर मंडरा है। कृषि विज्ञान केंद्र कठुआ के वैज्ञानिकों की मानें तो ऐसे में मौसम में येलोरस्ट की दस्तक लाजमी है। जिसके लिए किसानों को मौसम खुलते ही अपने खेतों की निगरानी रखने और फसल की बचाव के इंतजामों को सुनिश्चित करने की जरूरत है। कृषि विज्ञान केंद्र कठुआ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अमरीश वैद ने बताया कि गेहूं की फसल को येलोरस्ट से बचाने के लिए टिल्ट दवा (25 ईसी), प्रोपीकोनाजोल का एक मिलीलीटर दवा को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
मैदानी इलाकों में मौसम की बेरुखी से किसानों की चिंता का बढ़ना लाजमी है। ऐसा मौसम येलोरस्ट को दावत देकर किसानों की मेहनत को चौपट करने के लिए काफी है। हवा में नमी की मात्रा अधिक रहने और धूप नहीं होने का सीधा असर गेहूं की फसल पर पड़ता है। पिछले कुछ दिनों से पारा लुढ़कने और आर्द्रता बढ़ने का असर फसलों पर पड़ना शुरू हो गया है। आम तौर पर बारिश से हवा में नमी की मात्रा अधिक रहने और तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने से फसल के बीमारी की चपेट में आने की आशंका रहती है। समय पर रोकथाम न की गई तो यह 50 प्रतिशत से ज्यादा फसल चौपट कर सकता है।