कोर्ट ने कहा, यह साफ दिखता है कि हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए अल्ताफ अहमद भट और डॉ. मुदस्सिर गुल के शव इसलिए सौंप दिए गए क्योंकि लोगों और परिजनों ने दबाव बनाया। वहीं रामबन जिले के दूरदराज गांव के रहने वाले आमिर के पिता व रिश्तेदार चूंकि घाटी में ऐसा दबाव नहीं बना सकते थे, इसलिए उन्हें वंचित रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि शव परिजनों को न सौंपे जाने के लिए सरकार ने कायदा कानून की समस्या की दलील दी है। सरकार ने आमिर को आतंकी और उक्त दो लोगों को आतंकियों के मददगार के रूप में बताकर फर्क रखने का आधार बनाया है।
कोर्ट ने कहा कि शव सौंपने के मामले में रखे गए फर्क में किसी तरह का तर्क दिखाई नहीं देता। सरकार का ऐसा रवैया किसी भी कानूनी प्रक्रिया में न्याय और समानता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।