डोगरी भाषा के उत्थान को लेकर प्रदेश सरकार की निराशाजनक नीतियों के बावजूद डोगरी लेखन की विरास्त को डुग्गर पद्रेश की युवा पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। कम संसाधनों के अभाव के बीच युवा पीढ़ी डोगरी लेखन के कारवां सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने में भी लगी हुई है। कठुआ जिले के गांव रिज्जू की रहने वाली युवा डोगरी लेखिका सरोज बाला डोगरी भाषा की उभरती हुई लेखिका है। उनकी डोगरी कहानी संग्रह सोचै दी गैहराई उनके कुशल लेखन की पहचान भी है।
पुस्तक में लघु कथाएं है जो बेरोजगारी, परिवारक परेशानी, महिलाओं की परेशानियों के बारे में बताती है। पुस्तक लेखने के साथ-साथ सरोज बाला जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति और भाषा अकादमी की ओर से प्रकाशित होने वाली पुस्तक शिराजा के लिए भी लिखती है। सरोज बाला ने महसूर के किले, अमर पैलेस, बसोली पेंटिंग सहित अन्य विरास्त स्थलों के उपर डोगरी में संस्मरण लिखे ताकि युवा पीढ़ी में अपने मातृभाषा इन विरास्त स्थलों की जानकारी मिल सके।
यह भी पढ़ें- जम्मू-कश्मीर: सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन की अभूतपूर्व क्षमता, प्रदेश में 139 ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट स्थापित
उन्होंने कहा कि बसोली पेंटिंग में प्रकृति रंगों का उपयोग होता है और विषय में बड़ी सूंदरता से बयां करती है। उन्होंने कहा कि वह सोशल मीडिया के माध्यम से डोगरी लेखकों से जुड़ी जानकारी लोगों तक भी पहुंच रही है। सरोज बाला अपने डोगरी कहानी संग्रह सोचे दी गैहराई के लिए कुवर वियोगी युवा पुरस्कार और हिंदी काव्य संग्रह प्रकृति की गौद में के लिए मोक्षदायनी गुप्ता गंगा सम्मान मिला है। 2020 में युवा उत्सव में भाग लिया है, जहां डोगरी कहानी कही थी।