पहाड़ी चित्रकला और पश्मीना शाल के लिए विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगर बसोहली का समृद्ध इतिहास है। सबसे पुरानी तहसील बसोहली में धार्मिक स्थल और ऐतिहासिक धरोहरों मौजूद हैं, जो सरकार की अनदेखी का शिकार हो रही हैं। इसके चलते ऐतिहासिक और प्राचीन धरोहरों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए यदि समय रहते कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले समय में इन पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरों का जिक्र केवल किताबों तक ही सीमित रह जाएगा।
हजारों वर्ष पूर्व पाल वंश द्वारा बसोहली नगर में किले का निर्माण करवाया था। किले के निर्माण के लिए देशभर से कारीगरों को बुलवाकर किले का निर्माण संभव हो पाया था। किले की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से हुई चित्रकारी को आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है। इस किले की कुल सात मंजिल है, किले की पांच मंजिल भूमि में समा गई थी और किला का बचा हुआ भाग आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। पूरे राज्य में इस प्रकार का किला और कहीं भी नहीं है।
इतिहासकारों के अनुसार बसोहली किले के साथ लगते रानी तालाब का निर्माण पाल वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। इस तालाब के निर्माण के लिए विशेष प्रकार के ठोस पत्थरों को प्रयोग में लाया गया था। हैरानी की बात है कि रानी तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। तालाब की अनदेखी के चलते इसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इन धरोहरों की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग को सौंपी गई है, लेकिन आज तक इन धरोहरों के संरक्षण के लिए विभाग द्वारा कोई कदम नहीं उठाए गए।
बसोहली के पलाही इलाके मे 1500 साल पुराना आपशंभु शिव मंदिर है, जो कि पिछले कई वर्षों से पुरातत्व विभाग के अधीन है। पांडवों के समय के इस मंदिर को महादेरा मंदिर भी कहा जाता है, पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को अपने अधीन तो ले लिया है, मगर काम इस गति से चल रहा है कि आने वाले समय में धरोहरों के संरक्षण हेतु कई और वर्ष भी कम पड़ जाएंगे।