मेवाड़ और वागड़ के जनजाति क्षेत्र में लोक नृत्य गवरी आस्था का प्रतीक और शिव व शक्ति की आराधना का तरीका है। यह लोक नृत्य राखी के दूसरे दिन प्रारम्भ होता है और करीब 40 दिन तक चलता है। उदयपुर शहर के माली कॉलोनी में गुरुवार को गवरी नृत्य आयोजन किया गया। नृत्य के अंतिम दिन कालिका, चपल्या चोर, डाकू, राजा-रानी और बंजारा और बादशाही सवारी का मंचन किया गया।
भील आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली एक प्रसिद्ध लोक नृत्य नाटिका है। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गवरी नृत्य एक वृत्त बनाकर और
समूह में किया जाता है। इसके प्रमुख पात्र राई और बुढिया होते हैं। राई शक्ति पार्वती और बुढिया शिव का प्रतीक है।
इस नृत्य के माध्यम से विभिन्न कथाएं प्रस्तुत की जाती है। प्रतिवर्ष गांव के लोग गवरी नृत्य का संकल्प करते हैं। अलग-अलग गांवों में इसका मंचन होता है। नृत्य में महिला कलाकार कोई नहीं होती। महिला का किरदार भी पुरुष उसकी वेशभूषा धारण कर निभाते हैं। गवरी के मुख्य खेलों में
मीणा-बंजारा, हठिया, कालका, कान्ह-गूजरी, शंकरिया, दाणी जी, बाणियां, चपल्याचोर, देवी अंबाव, कंजर, खेतुड़ी, बादशाह की सवारी जैसे कई खेल
अत्यंत आकर्षक व मनोरंजक होते हैं।
इसका आयोजन मुख्यतया उदयपुर और राजसमन्द जिले में होता है। इस खेल का उद्भव स्थल उदयपुर माना जाता है। आदिवासी भील जनजाति इस जिले में बहुतायत से पाई जाती है। इस नृत्य का प्रचलन डूंगरपुर, भीलवाड़ा, उदयपुर व सिरोही आदि क्षेत्रों में प्रमुखता से देखने मिलता है। यह गौरी पूजा से सम्बंधित है। इसमें नाटकों के सदृश वेशभूषा होती है तथा अलग-अलग पात्र होते हैं।