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पाक से खाली हाथ आकर यहां बना करोड़पति, अब भी बनाता है पंचर

Thu, 27 Apr 2017 10:54 AM IST
मनीष कुमार शर्मा/जयपुर
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ओमप्रकाश सेठी - फोटो : amar ujala
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हम आपको ऐसे व्यक्ति के बारे में बताते हैं, जो पाकिस्तान से खाली हाथ आकर भारत में करोड़पति बना, अब भी बखूबी साइकलों की मरम्मत करता है। ये हैं जयपुर के राजापार्क निवासी 78 वर्षीय ओमप्रकाश सेठी।
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ओमप्रकाश ने बताया कि उन्होंने साइकिल सुधारते हुए ही अपने बेटे—बेटियों का पालन पोषण किया। आज एक बेटा नवीन कनाडा में मेडिकल कंपनी में काम करता है और दूसरा बेटा दीपक दुबई में सेटल है। यहां तक कि उनकी दो बेटियों में से एक ज्योति भी राजस्थान शासन सचिवालय में नौकरी कर रही है। ओमप्रकाश बताते हैं कि आज घर में कोई कमी नहीं है। पाकिस्तान के कुलाची में 14 नवंबर 1939 जन्मे ओमप्रकाश जब तीन साल के थे, तो उनके पिताजी मंगाराम सेठी उन्हें सन् 1942 में हिंदुस्तान लेकर आए। उस दौरान द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था।

जब युद्ध खत्म हुआ तो वे परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। इस बार उनके परिवार का मन वहां नहीं लगा और हिंदुस्तान में ही बसने का निर्णय किया। ये मौका उन्हें सन् 1947 में भारत—पाकिस्तान के विभाजन के दौरान मिला।
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विभाजन के दौरान ही पिता मंगाराम उन्हें बीकानेर में रहने वाले रिश्तेदारों के यहां लाए, लेकिन पानी और खाने—पीने की दिक्कतों के चलते उन्होंने बीकानेर भी छोड़ दिया। तब वे जयपुर में रहने के लिए आए, जहां उन्हें कुछ लोग जानते थे।

जयपुर के चौड़ा रास्ता में आकर 8 रुपए महीने के किराए पर मकान लिया। वर्ष 1967 में उनकी शादी सुमित्रा से हुई। जिसके बाद तो जिंदगी बदलने लगी। दो लड़के और दो लड़कियां हुईं। इनके पढ़ाई लिखाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने बनीपार्क के कबीर मार्ग में प्रताप भवन में 23 रुपए किराए पर दुकान ली।

ये दुकान 1 मार्च 1959 से आज तक उन्होंने किराए पर ले रखी है, जहां ये आज भी साइकिल सुधारने का ही काम करते हैं।
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आज भी जारी है एक आने से शुरू हुआ सफर

साइकिल में हवा भरते ओमप्रकाश - फोटो : amar ujala
ओमप्रकाश बताते हैं कि पिताजी की पाकिस्तान में ही प्राइवेट नौकरी थी, लेकिन जब पाकिस्तान छूट गया तो नौकरी भी छूट गई। यहां आने के बाद मैट्रिक तक उन्होंने पढ़ाई की। पैसों की कमी होने के कारण स्कूल के दौरान ही वे किशनपोल बाजार में पंजाब साईकिल वाले की दुकान में काम करने लगे।

स्कूल के बाद दोपहर 1 से 6 बजे तक काम करते। इसकी एवज में उन्हें रोजाना का एक आना मिलता। मेट्रिक पास करने के बाद सचिवालय में नौकरी भी लगी, लेकिन एक आंख में कुछ खराबी होने के कारण तीन महिने बाद ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

इसके बाद बनीपार्क के कबीर मार्ग के प्रताप भवन में दुकान किराए पर ली और 1959 में साइकिल मरम्मत करने का काम शुरू कर दिया, जो आज भी जारी है।
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