राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर विकास प्राधिकरण के सचिव और सीईओ को 29 मई को पेश होकर बताने को कहा है कि 1972 में याचिकाकर्ता को भूमि का आवंटन होने के बाद अब तक कब्जा क्यों नहीं दिया गया।
न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश द्वारका प्रसाद की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में कहा गया कि अजमेर के वैशालीनगर में याचिकाकर्ता के पिता के नाम भूमि का नामान्तरण था। ऐसे में यूआईटी ने 1972 में बारह सौ वर्गगज भूमि याचिकाकर्ता के पक्ष में आवंटित करने का निर्णय लिया। दस्तावेजों में गलत एन्ट्री होने के कारण भूमि को लेकर विवाद हो गया। इस पर एसडीओ और राजस्व मंडल ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया। वहीं समझौता समिति ने भी याचिकाकर्ता को भूमि आवंटित करने का निर्णय लिया। याचिका में कहा गया कि इसके बावजूद भी याचिकाकर्ता को भूमि का कब्जा नहीं दिया गया। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने दोनो अफसरों को अदालत में पेश होकर स्पष्टीकरण देने के आदेश दिए हैं।