सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में केन्द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय से पर्यावरण स्वीकृति लिए बिना किए जा रहे बजरी खनन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। साथ ही अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह में नदियों को सर्वे करवा कर शपथ पत्र सहित अध्ययन रिपोर्ट पेश करें कि नदियों में नई बजरी कितनी आ रही है और उनसे कितनी बजरी निकाली जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी लोकुर व दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने यह अंतरिम निर्देश नवीन शर्मा व राज्य सरकार और एक गैर सरकारी संगठन की एसएलपी पर सुनवाई करते हुए दिया।
सुनवाई के दौरान प्रार्थी एनजीओ ने कहा कि लीज धारकों ने अभी तक भी पर्यावरण स्वीकृति नहीं ली है और उसके बिना ही प्रदेश में बजरी का खनन किया जा रहा है। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि चार साल हो गए और अभी तक भी पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी नही ली है। जवाब में लीज होल्डर ने कहा कि उन्होंने पर्यावरण स्वीकृति के लिए केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय में आवेदन कर रखा है और उनका आवेदन लंबित है। ऐसे में पर्यावरण स्वीकृति नहीं मिलने के लिए वे जिम्मेदार नहीं है।
इस पर अदालत ने कहा कि यह भयभीत करने वाला है कि राजस्थान मेंं बजरी खनन को लेकर क्या हो रहा है और बिना पर्यावरण की मंजूरी लिए लीज धारकों द्वारा बजरी का खनन किया जा रहा है। राज्य सरकार पर भी गंभीर आरोप है कि वह बजरी खनन करने वालों से मिलीभगत कर बजरी का खनन करवा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर रोक नहीं लगाने के संबंध में दी गई दलीलों को खारिज करते हुए प्रदेश में बिना पर्यावरण स्वीकृति के हो रहे बजरी खनन पर रोक लगा दी।