फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

देशभर में जिस बिल को लेकर मचा है हंगामा वो इसलिए है विवादित, जानें...

Tue, 24 Oct 2017 11:31 AM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
विज्ञापन
फाइल फोटो।
विज्ञापन
लोकसेवकों को बचाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाले विवादित बिल से देशभर में कड़ी आलोचना झेल रही राजस्थान सरकार मंगलवार को बैकफुट पर आ गई। अब इस बिल को सदन की मंजूरी के बाद पुनर्विचार के लिए प्रवर समिति में भेज दिया गया है।
विज्ञापन


'दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017' को लेकर राजस्थान की राजे सरकार देशभर के मीडिया के साथ विपक्ष के निशाने पर भी है। कांग्रेस इस बिल के विरोध में विरोध प्रदर्शन कर रही है। वहीं आम आदमी की नाराजगी बिल के विरोध में सोशल मीडिया पर दिख रही है।

दरअसल सरकार के नए बिल के अनुसार अब राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाना अब आसान नहीं होगा। इनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी।
विज्ञापन


बिल के ये हैं प्रावधान, जिनका हो रहा है विरोध

- बिल पारित हो जाता है, तो सीआरपीसी और आईपीसी में संशोधन करना होगा। संशोधन के तहत धारा 228 बी जोड़ी जाएगी। जबकि कानूनविदों के अनुसार सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए कोर्ट का सहारा लिया जाता है। इस धारा पर भी संकट खड़ा हो जाएगा।

- बिल के मसौदे के अनुसार राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी। ड्यूटी के दौरान यदि नौकरशाहों के खिलाफ कोई शिकायत है, तो भी एफआईआर से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेनी होगी।

- सोशल मीडिया भी इसके दायरे में आएगा। यदि मामला दर्ज होने से पहले मीडिया या सोशल मीडिया पर संबंधित लोक सेवक का नाम उजागर हो जाता है, तो नाम उजागर करने वाले के खिलाफ मामला दर्ज हो सकेगा।

लोकसेवकों के लिए सुरक्षा कवच है बिल

फाइल फोटो।
- सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती थी, तो अदालत में इस्तगासा दायर किया जा सकता था, लेकिन इस बिल के बाद कोर्ट भी इस्तगासे या प्रसंज्ञान से अनुसंधान के आदेश नहीं दे सकेगी।

- इस बिल में 180 दिन की समयावधि भी रखी गई है। इसके अनुसार शिकायत होने के बाद सरकारी कर्मचारी या अन्य लोगों के खिलाफ सरकार 180 दिन में निर्णय लेगी। तय समयावधि के बाद अगर कोई निर्णय नहीं आता है, तो सबंधित अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोर्ट के जरिए ही रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है।

- यदि सरकार की स्वीकृति से पूर्व आरोपी कर्मचारी या अधिकारी का नाम मीडिया रिपोर्ट्स में आता ​है, तो ऐसे मामलों में दो वर्ष की सजा का प्रवाधान है। मीडिया रिपोर्ट्स में आरोपी का नाम सरकार की अनुमति के बाद ही आ सकता है।

- अब तक सिर्फ गजेटेड ऑफिसर को ही लोक सेवक माना गया था, लेकिन इस बिल में सरकार ने यह दायरा बढ़ा दिया है। अब पंच-सरपंच तक लोक सेवक माने जाएंगे।
विज्ञापन

विपक्षियों के निशाने पर है सरकार

वसुंधरा राजे
प्रस्तावित बिल को सोशल मीडिया पर भी जमकर ट्रोल किया जा रहा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्विटर पर इसे राजशाही का नमूना बताया है। आप के कुमार विश्वास ने भी इसका विरोध किया है। स्वयंसेवी संस्था पीयूसीएल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की घोषणा  की है। 

उधर, राजस्थान के पंचायती राज मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने सफाई दी है कि नौकरशाहों के खिलाफ इस्तगासे के जरिए झूठी शिकायतों की बाढ़ आ गई है, जिससे नौकरशाह विकास के काम नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि इस बिल का मुख्य मकसद नौकरशाहों को बदनाम करने से रोकना है न कि मीडिया पर सेंसरशिप लगाना। 

इधर, गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने कहा है कि ईमानदार अधिकारी काम करने से डरते हैं कि कोई उन्हें केस में न फंसा दे। साफ छवि के अधिकारियों को बचाने के लिए ये बिल लाया जा रहा है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें